ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextइन्द्र के निमित्त दूरवर्ती अथवा परवर्ती स्थान में तथा शर्यणावत नामक तालाब में
निचुड़ने वाले सोम हमें अभिमत फल दें. (२२)
य आर्जीकेषु कृत्वसु ये मध्ये पस्त्यानाम्. ये वा जनेषु पञ्चसु.. (२३)
आर्जीक एवं कृत्व नामक देशों में निचुड़ने वाले तथा सरस्वती और पांच नदियों के
समीप निचुड़ने वाले सोम हमें अभिमत फल दें. (२३)
ते नो वृष्टिं दिवस्परि पवन्तामा सुवीर्यम्. सुवाना देवास इन्दवः.. (२४)
वे निचोड़े गए, दीप्तिशाली एवं चमस आदि पात्रों में टपकते हुए सोम हमें आकाश से
होने वाली वर्षा एवं शोभन बलयुक्त पुत्र दें. (२४)
पवते हर्यतो हरिर्गृणानो जमदग्निना. हिन्वानो गोरधि त्वचि.. (२५)
देवों की अभिलाषा करते हुए, हरितवर्ण, गाय के चमड़े पर रखे हुए एवं जमदग्नि ऋषि
द्वारा स्तुत सोम दशापवित्र के द्वारा शुद्ध होते हैं. (२५)
प्र शुक्रासो वयोजुवो हिन्वानासो न सप्तयः. श्रीणाना अप्सु मृञ्जत.. (२६)
ऋत्विजों द्वारा दीप्तिशाली, अन्न देते हुए एवं गाय के दूध से मिश्रित सोम जल में इस
प्रकार मसले जाते हैं, जैसे घोड़े को स्नान कराया जाता है. (२६)
तं त्वा सुतेष्वाभुवो हिन्विरे देवतातये. स पवस्वानया रुचा.. (२७)
हे सोम! यज्ञ में ऋत्विज् तुम्हें पत्थरों की सहायता से इंद्रादि देवों के लिए निचोड़ते हैं.
तुम दीप्ति वाली धारा के साथ द्रोणकलश में गिरो. (२७)
आ ते दक्षं मयोभुवं वह्निमद्या वृणीमहे. पान्तमा पुरुस्पृहम्.. (२८)
हे सोम! हम स्तोता आज तुम्हारे सुखदाता, धनादि के वहन करने वाले, शत्रुओं से रक्षा
करने वाले एवं बहुतों द्वारा अभिलषित बल को वरण करते हैं. (२८)
आ मन्द्रमा वरेण्यमा विप्रमा मनीषिणम्. पान्तमा पुरुस्पृहम्.. (२९)
हे मदकारक व सबके द्वारा वरण करने योग्य सोम! बुद्धिमान्, मनीषी, सबके रक्षक
तथा बहुतों द्वारा अभिलाषा के योग्य तुमको हम वरण करते हैं. (२९)
आ रयिमा सुचेतुनमा सुक्रतो तनूष्वा. पान्तमा पुरुस्पृहम्.. (३०)
हे शोभन-कर्म वाले सोम! हम तुम्हारे धन का वरण करते हैं. तुम हमारे पुत्रों को धन दो.
हे सबके रक्षक एवं बहुतों द्वारा अभिलषित सोम! हम तुम्हारी सेवा करते हैं. (३०)
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