ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसूक्त—२६ देवता—पवमान सोम
तममृक्षन्त वाजिनमुपस्थे अदितेरधि. विप्रासो अण्व्या धिया.. (१)
मेधावी अध्वर्यु आदि वेगशाली सोम को धरती की गोद में अपनी उंगलियों और स्तुतियों
द्वारा मसलते हैं. (१)
तं गावो अभ्यनूषत सहस्रधारमक्षितम्. इन्दुं धर्त्तारमा दिव:.. (२)
स्तुतियां अनेक धाराओं वाले, क्षीणतारहित, दीप्तिशाली एवं स्वर्ग को धारण करने वाले
सोम की स्तुति करती हैं. (२)
तं वेधां मेधयाह्यन्यवमानमधि द्यवि. धर्णसिं भूरिधायसम्.. (३)
लोग सबको धारण करने वाले, अनेक कर्मों के कर्त्ता, विधाता एवं पवित्र होते हुए सोम
को स्वर्ग की ओर भेजते हैं. (३)
तमह्यन्भुरिजोर्धिया संवसानं विवस्वत:. पतिं वाचो अदाभ्यम्.. (४)
सेवा करने वाले ऋत्विज् पात्र में रहने वाले, स्तुतियों के स्वामी एवं अहिंसनीय सोम को
दोनों हाथों की उंगलियों के द्वारा आगे बढ़ाते हैं. (४)
तं सानावधि जामयो हरिं हिन्वन्त्यद्रिभि:. हर्यतं भूरिचक्षसम्.. (५)
उंगलियां हरे रंग वाले, सुंदर एवं बहुतों को देखने वाले सोम को ऊंचे स्थान की ओर
प्रेरित करती हैं. (५)
तं त्वा हिन्वन्ति वेधस: पवमान गिरावृधम्. इन्दविन्द्राय मत्सरम्.. (६)
हे स्तुतियों द्वारा बढ़ते हुए, दीप्तिशाली, नशीले एवं निचुड़ते हुए सोम! ऋत्विज् तुम्हें इंद्र
के पास जाने के लिए प्रेरित करते हैं. (६)
सूक्त—२७ देवता—पवमान सोम
एष कविरभिष्टुतः पवित्रे अधि तोशते. पुनानो घ्नन्नप स्रिधः.. (१)
मेधावी, चारों ओर से स्तुत एवं पवित्र होते हुए सोम शत्रुओं का विनाश करके
दशापवित्र से हरिण के काले चमड़े पर जाते हैं. (१)
एष इन्द्राय वायवे स्वर्जित्परि षिच्यते. पवित्रे दक्षसाधनः.. (२)
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