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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1399 of 1855

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Page 1399

त्वष्टारमग्रजां गोपां पुरोयावानमा हुवे. इन्दुरिन्द्रो वृषा हरिः पवमानः प्रजापतिः.. (९)
मैं पूर्व में उत्पन्न, प्रजाओं के पालक एवं देवों के आगे चलने वाले त्वष्टा देव को बुलाता
हूं. हरे रंग के पवमान सोम देवों के स्वामी एवं अभिलाषापूरक हैं. (९)
वनस्पतिं पवमान मध्वा समङ्ग्धि धारया.
सहस्रवल्शं हरितं भ्राजमानं हिरण्ययम्.. (१०)
हे पवमान सोम! कभी हरे रंग वाले तथा कभी सुनहरे रंग के, दीप्तिशाली एवं हजार
शाखाओं वाले वनस्पति देव का मधुर धारा से संस्कार करो. (१०)
विश्वे देवाः स्वाहाकृतिं पवमानस्या गत.
वायुर्बृहस्पतिः सूर्योऽग्निरिन्द्रः सजोषसः.. (११)
हे विश्वेदेव! वायु, बृहस्पति, सूर्य, अग्नि और इंद्र! तुम सब एकत्र होकर पवमान सोम
की ओर स्वाहा शब्द के साथ जाओ. (११)
सूक्त—६ देवता—पवमान सोम
मन्द्रया सोम धारया वृषा पवस्व देवयुः. अव्यो वारेष्वस्मयुः.. (१)
हे अभिलाषापूरक, देवकामी एवं हमें चाहने वाले सोम! तुम हमारी रक्षा करो तथा
मादक धारा से दशापवित्र में टपको. (१)
अभि त्यं मद्यं मदमिन्दविन्द्र इति क्षर. अभि वाजिनो अर्वतः.. (२)
हे सोम! तुम स्वामी हो. इसलिए मादक धाराएं बरसाओ एवं हमें शक्तिशाली घोड़े दो.
(२)
अभि त्यं पूर्व्यं मदं सुवानो अर्ष पवित्र आ. अभि वाजमुत श्रवः.. (३)
हे सोम! तुम निचुड़ते हुए उस प्राचीन एवं नशीले रस को दशापवित्र नामक पात्र में
टपकाओ तथा हमें अन्न एवं बल दो. (३)
अनु द्रप्सास इन्दव आपो न प्रवतासरन्. पुनाना इन्द्रमाशत.. (४)
द्रुतगति वाले और टपकते हुए सोम इस प्रकार इंद्र के पीछे चलते हैं, जिस प्रकार जल
नीचे की ओर बहते हैं एवं उन्हें व्याप्त करते हैं. (४)
यमत्यमिव वाजिनं मृजन्ति योषणो दश. वने क्रीळन्तमत्यविम्.. (५)
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