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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

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हे मित्र विष्णु! तुम अधिक पराक्रम दिखाओ. हे द्युलोक! तुम वज्र को जाने के लिए
स्थान दो. तुम और मैं दोनों वृत्र को मारेंगे व नदियों को सागर की ओर ले जाएंगे. नदियां इंद्र
की आज्ञा के अनुसार बहें. (१२)
सूक्त—९० देवता—मित्र व वरुण
ऋधगित्था स मर्त्यः शशमे देवतातये.
यो नूनं मित्रावरुणावभिष्ट्य आचक्रे हव्यदातये.. (१)
जो मनुष्य यजमान की अभिलाषा पूर्ण करने के लिए मित्र व वरुण को अपने सामने
करता है, वह इस प्रकार यज्ञ के लिए हवि तैयार करता है, यह सत्य है. (१)
वर्षिष्ठक्षत्रा उरुचक्षसा नरा राजाना दीर्घश्रुत्तमा.
ता बाहुता न दंसना रथर्यतः साकं सूर्यस्य रश्मिभिः.. (२)
अत्यंत बढ़े हुए बल वाले, देखने में विशाल, यज्ञकर्मों के नेता, दीप्तिशाली व अतिशय
विद्वान् वे मित्र व वरुण दोनों भुजाओं के समान सूर्य की किरणों के साथ कर्म करते हैं. (२)
प्र यो वां मित्रावरुणाजिरो दूतो अद्रवत्. अयःशीर्षा मदेरघुः.. (३)
हे मित्र व वरुण! जो गतिशील यजमान तुम्हारे सामने जाता है, वह देवों का दूत होता
है, उसका सिर सोने से सुशोभित होता है एवं नशीला सोम प्राप्त करता है. (३)
न यः संपृच्छे न पुनर्हवीतवे न संवादाय रमते.
तस्मान्नो अद्य समृतेरुरुष्यतं बाहुभ्यां न उरुष्यतम्.. (४)
हे मित्र व वरुण! जो शत्रु भली प्रकार पूछने पर भी प्रसन्न नहीं होता और जो बार-बार
बुलाने एवं बातचीत करने पर भी आनंदित नहीं होता, आज हमें उसके साथ युद्ध से बचाओ.
हमें उसकी भुजाओं से बचाओ. (४)
प्र मित्राय प्रार्यम्णे सचथ्यमृतावसो.
वरूथ्यं१ वरुणे छन्द्यं वचः स्तोत्रं राजसु गायत.. (५)
हे यज्ञरूपी धन वाले उद्गाताओ! तुम मित्र एवं अर्यमा के लिए सेवा करने योग्य एवं
यज्ञशाला में उत्पन्न स्तुतियां सुनाओ. तुम वरुण के लिए प्रसन्नता देने वाले गीत गाओ एवं
दीप्तिशाली मित्र, अर्यमा और वरुण की प्रशंसा करो. (५)
ते हिन्विरे अरुणं जेन्यं वस्वेकं पुत्रं तिसृणाम्.
ते धामान्यमृता मर्त्यानामदब्धा अभि चक्षते.. (६)
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