ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1372 of 1855
Read in contextत्यान्नु पूतदक्षसो दिवो वो मरुतो हुवे. अस्य सोमस्य पीतये.. (१०)
हे पवित्र बल वाले एवं अपने तेज से ही दीप्त मरुतो! मैं इस सोमरस को पीने के लिए
तुम्हें बुलाता हूं. (१०)
त्यान्नु ये वि रोदसी तस्तभुर्मरुतो हुवे. अस्य सोमस्य पीतये.. (११)
जिन मरुतों ने द्यावा-पृथिवी को स्तब्ध किया है, मैं उन्हीं को सोमरस पीने के लिए
बुलाता हूं. (११)
त्यं नु मारुतं गणं गिरिक्षां वृषणं हुवे. अस्य सोमस्य पीतये.. (१२)
मैं सर्वत्र प्रसिद्ध, पर्वत पर स्थित एवं जलों को बरसाने वाले मरुतों को सोमरस पीने के
लिए बुलाता हूं. (१२)
सूक्त—८४ देवता—इंद्र
आ त्वा गिरो रथीरिवाऽस्थुः सुतेषु गिर्वणः.
अभि त्वा समनूषतेन्द्र वत्सं न मातरः.. (१)
हे स्तुतिपात्र इंद्र! सोमरस निचूड़ जाने पर हमारी स्तुतियां रथ पर बैठे वीरों के समान
तुम्हारे पास स्थित होती हैं. हे इंद्र! गाएं जिस प्रकार बछड़ों को देखकर रंभाती है, उसी प्रकार
हमारी स्तुतियां तुमसे संबंधित हैं. (१)
आ त्वा शुक्रा अचुच्यवुः सुतास इन्द्र गिर्वणः.
पिबा त्व१ स्यान्धस इन्द्र विश्वासु ते हितम्.. (२)
हे स्तुति योग्य इंद्र! पात्रों को चमकाते हुए एवं हमारे द्वारा निचोड़े गए सोम तुम्हारे पास
आवें. तुम इस सोम को पिओ. चारों ओर से चरु-पुरोडाश आदि तुम्हारे समीप आवें. (२)
पिबा सोमं मदाय कमिन्द्र श्येनाभृतं सुतम्.
त्वं हि शश्वतीनां पती राजा विशामसि.. (३)
हे इंद्र! वाजरूप-धारिणी गायत्री द्वारा लाए गए एवं हम लोगों द्वारा निचोड़े गए सोमरस
को नशे के लिए सुखपूर्वक पिओ. तुम सभी मरुद्गणों के पालनकर्त्ता और अपने तेज से
दीप्तिशाली हो. (३)
श्रुधी हवं तिरश्च्या इन्द्र यस्त्वा सपर्यति.
सुवीर्यस्य गोमतो रायस्पूर्धि महाँ असि.. (४)
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