ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextशिक्षा ण इन्द्र राय आ पुरु विद्वाँ ऋचीषम. अवा नः पार्ये धने.. (९)
हे स्तुति द्वारा संबोधन करने योग्य एवं विद्वान् इंद्र! शत्रुओं का धन लेकर हमें अनेक
बार दो. (९)
अतश्चिदिन्द्र ण उपा याहि शतवाजया. इषा सहस्रवाजया.. (१०)
हे इंद्र! द्युलोक से ही सैकड़ों अन्नों एवं हजारों शक्तियों से युक्त होकर हमारे पास आओ.
(१०)
अयाम धीवतो धीयोऽर्वद्भिः शक्र गोदरे. जयेम पृत्सु वज्रिवः.. (११)
हे समर्थ इंद्र! यज्ञकर्मयुक्त हम युद्ध में शत्रुओं को जीतने के लिए यज्ञ करेंगे. हे पर्वतों
को विदीर्ण करने वाले एवं वज्रधारी इंद्र! हम युद्धों में घोड़ों के द्वारा विजयी बनेंगे. (११)
वयमु त्वा शतक्रतो गावो न यवसेष्वा. उक्थेषु रणयामसि.. (१२)
हे अनेक कर्मों वाले इंद्र! गोपाल गायों को जिस प्रकार जौ के खेत में विशेष रूप से
प्रसन्न करता है, उसी प्रकार हम तुम्हें उक्थों द्वारा प्रसन्न करेंगे. (१२)
विश्वा हि मर्त्यत्वनानुकामा शतक्रतो. अगन्म वज्रिन्नाशसः.. (१३)
हे सौ यज्ञों वाले इंद्र! संसार के सभी लोग इच्छाएं रखते हैं. हे वज्रधारी इंद्र! हम भी
मनचाही वस्तुएं प्राप्त करें. (१३)
त्वे सु पुत्र शवसोऽवृत्रन् कामकातयः. न त्वामिन्द्राति रिच्यते.. (१४)
हे बलपुत्र इंद्र! अभिलाषापूर्ण शब्द बोलने वाले लोग तुम्हारा सहारा लेते हैं. कोई भी
देव तुमसे बढ़कर नहीं हो सकता. (१४)
स नो वृषन्त्सनिष्या सं घोरया द्रवित्न्वा. धियाविद्धि पुरन्ध्या.. (१५)
हे अभिलाषापूरक इंद्र! तुम सर्वाधिक धन देने वाली, शत्रुओं को भयभीत करने वाली,
शत्रुओं को भगाने वाली एवं अनेक को धारण करने वाली यज्ञक्रिया के द्वारा हमारा पालन
करो. (१५)
यस्ते नूनं शतक्रतविन्द्र द्युम्नितमो मदः. तेन नूनं मदे मदेः.. (१६)
हे सौ यज्ञों वाले इंद्र! प्राचीनकाल में हमने तुम्हारे लिए जो सर्वाधिक यज्ञ वाला सोमरस
निचोड़ा था, उसके द्वारा प्रमुदित होकर एवं धन देकर हमें प्रसन्न बनाओ. (१६)
यस्ते चित्रश्रवस्तमो य इन्द्र वृत्रहन्तम. य ओजोदातमो मदः.. (१७)
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