ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextता वां विश्वको हवते तनूकृथे मा नो वि यौष्टं सख्या मुमोचतम्.. (३)
हे बहुतों का पालन करने वाले अश्विनीकुमारो! मेरे पुत्र विष्णापु को धन देने की इच्छा
से तुमने धन दिया था. मैं अश्वक ऋषि संतान पाने के उद्देश्य से तुम्हें बुलाता हूं. हमारी मित्रता
नष्ट मत करना. तुम यहां आकर अपने घोड़ों की लगाम अलग करो. (३)
उत त्यं वीरं धनसामृजीषिणं दूरे चित्सन्तमवसे हवामहे.
यस्य स्वादिष्ठा सुमतिः पितुर्यथा मा नो वि यौष्टं सख्या मुमोचतम्.. (४)
हे अश्विनीकुमारो! हम वीर, धन का उपभोग करने वाले, ऋजीश युक्त एवं दूरस्थित
विष्णापु को बुलाते हैं. उसकी स्तुति भी मुझ पिता के समान ही सरस है. हमारी मित्रता को
अलग मत करो. तुम यहां आकर अपने घोड़ों की लगाम अलग करो. (४)
ऋतेन देवः सविता शमायत ऋतस्य शृङ्गमूर्विया वि पप्रथे.
ऋतं सासाह महि चित्पृतन्यतो मा नो वि यौष्टं सख्या मुमोचतम्.. (५)
हे अश्विनीकुमारो! सत्य के द्वारा सूर्य अपनी किरणें शांत करते हैं. उसके बाद वे सत्य
के सींग के समान अपनी किरणों का विस्तार करते हैं. सूर्य युद्ध करने वाले शत्रुओं को
वास्तव में पराजित करते हैं. हमारी मित्रता अलग न हो. तुम यहां आकर अपने घोड़ो की
लगाम अलग करो. (५)
सूक्त—७६ देवता—अश्विनीकुमार
द्युम्नी वां स्तोमो अश्विना क्रिविर्न सेक आ गतम्.
मध्वः सुतस्य स दिवि प्रियो नरा पातं गौराविवेरिणे.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! द्युम्नीक तुम्हारा स्तोता है. वर्षा ऋतु में जिस प्रकार कुएं का पानी
पास आ जाता है, उसी प्रकार तुम आओ. हे नेताओ! यह स्तोता दीप्तिशाली यज्ञ में नशीले
सोमरस को प्रिय समझता है. गौर मृग जिस प्रकार तालाब में पानी पीता है, उसी प्रकार तुम
सोमरस पिओ. (१)
पिबतं घर्मं मधुमन्तमश्विना बर्हिः सीदतं नरा.
ता मन्दसाना मनुषो दुरोण आ नि पातं वेदसा वयः.. (२)
हे अश्विनीकुमारो! मधुर एवं पात्रों में टपकने वाले सोमरस को पिओ. हे नेताओ! यज्ञ
के कुशों पर बैठो. तुम यजमान की यज्ञशाला में प्रसन्न होकर पुरोडाश आदि के साथ सोमरस
पिओ. (२)
आ वां विश्वाभिरूतिभिः प्रियमैधा अहूषत.
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