ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1302 of 1855
Read in contextअध प्रियमिषिराय षष्टिं सहस्रासनम्. अश्वानामिन्न वृष्णाम्.. (२९)
इस समय धन आदि का दान करने वाले राजा पृथुश्रवा की कृपा से मैंने घोड़ों के समान
अभिलाषापूरक साठ हजार गायों को पाया. (२९)
गावो न यूथमुप यन्ति वध्रय उप मा यन्ति वध्रयः.. (३०)
गाएं जिस प्रकार अपने झुंड में जाती हैं, उसी प्रकार पृथुश्रवा द्वारा दिए हुए बधिया बैल
मेरे पास आते हैं. (३०)
अध यच्चारथे गणे शतमुष्ट्राँ अचिक्रदत्.
अध श्वित्नेषु विंशतिं शता.. (३१)
ऊंटों का समूह जिस समय वन को जा रहा था, उस समय पृथुश्रवा ने मुझे सौ ऊंट देने
के लिए बुलाया था एवं मुझे देने के लिए वह बीस हजार गाएं भी लाए थे. (३१)
शतं दासे बल्बूथे विप्रस्तरुक्ष आ ददे.
ते ते वायविमे जना मदन्तीन्द्रगोपा मदन्ति देवगोपाः.. (३२)
मुझ बुद्धिमान् ब्राह्मण ने गायों और अश्वों के रक्षक बल्बूथ नामक दास से सौ गाएं और
सौ घोड़े पाए थे. हे वायु! ये सब लोग तुम्हारे हैं. वे इंद्र एवं देवों द्वारा सुरक्षित होकर प्रसन्न
होते हैं. (३२)
अध स्या योषणा मही प्रतीची वशमश्व्यम्. अधिरुक्मा वि नीयते.. (३३)
इस समय महती पूज्या, सामने मुंह करके खड़ी, सोने के गहने पहने हुए एवं राजा
पृथुश्रवा द्वारा मेरे लिए दान की गई युवती को अश्वपुत्र वश अर्थात् मेरे सामने लाया जा रहा
है. (३३)
सूक्त—४७ देवता—आदित्य
महि वो महतामवो वरुण मित्र दाशुषे.
यमादित्या अभि द्रुहो रक्षथा नेमघं नशदनेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (१)
हे महान् मित्र एवं वरुण! हवि देने वाले यजमान की तुम जो रक्षा करते हो, वह महान्
है. हे आदित्यो! तुम शत्रु के हाथ से जिस यजमान की रक्षा करते हो, उसे पाप नहीं छू
सकता. तुम्हारी रक्षाएं उपद्रवरहित एवं शोभन हैं. (१)
विदा देवा अघानामादित्यासो अपाकृतिम.
पक्षा वयो यथोपरि व्य१स्मे शर्म यच्छतानेहसो व ऊतयः सुऊतयो व ऊतयः.. (२)