ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextविश्वेषामिरज्यन्तं वसूनां सासह्वांसं चदिष्य वर्पसः. कृपयतो नूनमत्यथ.. (१६)
समस्त संपत्तियों के स्वामी, शत्रुओं को रोकने वाले, युद्ध में शत्रु को कंपित करने वाले
एवं हराने वाले इंद्र की स्तुति करो. इंद्र शीघ्र धन देंगे. (१६)
महः सु वो अरमिषे स्तवामहे मीळहुषे अरङ्कमाय जग्मये.
यज्ञेभिर्गीर्भिर्विश्वमनुषां मरुतामियक्षसि गाये त्वा नमसा गिरा.. (१७)
हे महान्, अभिलाषापूरक, सर्वत्र गमनशील, तीव्र गति वाले इंद्र! मैं तुम्हारे आने की
इच्छा करता हूं. हे मरुतों के नेता एवं सब प्राणियों के स्वामी इंद्र! हम यज्ञों, स्तुतियों एवं
नमस्कारों द्वारा तुम्हारे गुण गाते हैं. (१७)
ये पातयन्ते अज्मभिर्गिरीणां स्नुभिरेषाम्.
यज्ञं महिष्वणीनां सुम्रं तुविष्वणीनां प्राध्वरे.. (१८)
जो मरुद्गण बादलों के बहने वाले एवं शक्तिकारक जलों के साथ गिरते हैं, उन्हीं महान्
ध्वनि वाले मरुतों के निमित्त हम यज्ञ करेंगे एवं उनके द्वारा दिया हुआ सुख पावेंगे. (१८)
प्रभङ्गं दुर्मतीनामिन्द्र शविष्ठा भर.
रयिमस्मभ्यं युज्यं चोदयन्मते ज्येष्ठं चोदयन्मते.. (१९)
हे इंद्र! तुम दुष्ट बुद्धि वालों को नष्ट करने वाले हो. हम तुमसे याचना करते हैं. हे
अतिशय शक्तिशाली इंद्र! हमारे लिए उचित धन हमें दो. हे धन प्रेरित करने वाली बुद्धि से
युक्त इंद्र देव! हमें उत्तम धन दो. (१९)
सनितः सुसनितरुग्र चित्र चेतिष्ठ सूनृत.
प्रासहा सम्राट् सहुरिं सहन्तं भुज्युं वाजेषु पूर्व्यम्.. (२०)
हे दाता, उग्र, विचित्र, अतिशय-ज्ञानी, शोभन-सत्ययुक्त, शत्रुओं को हराने वाले एवं
सबके स्वामी इंद्र! तुम शत्रु को हराने वाला, सहनशील, भोग योग्य तथा स्थायी धन हमें
संग्राम में दो. (२०)
आ स एतु य ईवदाँ अदेवः पूर्तमाददे.
यथा चिद्दशो अश्व्यः पृथुश्रवसि कानीतेऽस्या व्युष्याददे.. (२१)
वे अश्व के पुत्र वश यहां आवें, जो देव नहीं हैं एवं जिन्होंने कन्या के पुत्र पृथुश्रवा से धन
प्राप्त किया था. (२१)
षष्टिं सहस्राश्व्यस्यायुतासनमुष्ट्रानां विंशतिं शता.
दश श्यावीनां शता दश त्र्यरुषीणां दश गवां सहस्रा.. (२२)
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