ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextहे अग्नि! हम तुम्हारे लिए ही शोभन कर्म वाले एवं सभी दिवसों में तत्त्वद्रष्टा बनकर
दुर्गम स्थानों को पार करेंगे. (३०)
अग्निं मन्द्रं पुरुप्रियं शीरं पावकशोचिषम्. हृद्भिर्मन्द्रेभिरीमहे.. (३१)
हम प्रसन्न, बहुतों के प्रिय, यज्ञों में सोने वाले एवं पवित्र दीप्ति वाले अग्नि से मनोहर
तथा मादक स्तोत्रों द्वारा याचना करते हैं. (३१)
स त्वमग्ने विभावसुः सृजन्सूर्यो न रश्मिभिः. शर्धन्तमांसि जिघ्नसे.. (३२)
हे दीप्तिरूपी धन वाले अग्नि! तुम सूर्य के समान किरणों द्वारा अपनी शक्ति बढ़ाते हुए
अंधकारों का नाश करते हो. (३२)
तत्ते सहस्व ईमहे दात्रं यन्नोपदस्यति. त्वदग्ने वार्यं वसु.. (३३)
हे शक्तिशाली अग्नि! तुम्हारा जो वरण एवं दान योग्य धन क्षीण नहीं होता, हम उसी की
याचना करते हैं. (३३)
सूक्त—४४ देवता—अग्नि
समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम्. आस्मिन् हव्या जुहोतन.. (१)
हे ऋत्विजो! अतिथि के समान प्रिय अग्नि की समिधा द्वारा सेवा करो, उन्हें घृत द्वारा
जगाओ. प्रज्वलित अग्नि में हव्यों का हवन करो. (१)
अग्ने स्तोमं जुषस्व मे वर्धस्वानेन मन्मना. प्रति सूक्तानि हर्य नः.. (२)
हे अग्नि! तुम मेरे स्तुति मंत्रों को स्वीकार करो, इस मनोहर स्तोत्र द्वारा बढ़ो एवं हमारे
सूक्तों की कामना करो. (२)
अग्निं दूतं पुरो दधे हव्यवाहमुप ब्रुवे. देवाँ आ सादयादिह.. (३)
मैं देवों के दूत एवं हव्य वहन करने वाले अग्नि को अपने सामने स्थापित करता हूं तथा
उनकी स्तुति करता हूं. वे इस यज्ञ में देवों को बैठावें. (३)
उत्ते बृहन्तो अर्चयः समिधानस्य दीदिवः. अग्ने शुक्रांस ईरते.. (४)
हे दीप्तिशाली अग्नि! जब तुम प्रज्वलित होते हो, तब तुम्हारी बढ़ी हुई एवं ज्वलंत
किरणें ऊपर उठती हैं. (४)
उप त्वा जुह्वो३ मम घृताचीर्यन्तु हर्यत. अग्ने हव्या जुषस्व नः.. (५)
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