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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1283 of 1855

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Page 1283

स क्षपः परि षस्वजे न्यू१सो मायया दधे स विश्वं परि दर्शतः.
तस्य वेनीरनु व्रतमूषस्तिस्रो अवर्धयन्नभन्तामन्यके समे.. (३)
वरुण रात्रियों का आलिंगन करते हैं. दर्शनीय वरुण उन्नति करते हुए अपनी माया द्वारा
संसार को धारण करते हैं. वरुण के व्रत की कामना करने वाले प्रातः, दोपहर एवं संध्या तीनों
कालों के यज्ञ को बढ़ाते हैं. वे सभी शत्रुओं को समाप्त करें. (३)
यः ककुभो निधारयः पृथिव्यामधि दर्शतः.
स माता पूर्व्यं पदं तद्वरुणस्य सप्त्यं स हि गोपा इवेर्यो नभन्तामन्यके समे.. (४)
जो वरुण पृथ्वि के ऊपर दर्शनीय बनकर दिशाओं को धारण करते हैं, वे प्राचीन स्वर्ग
एवं हमारे विचरणस्थान धरती के निर्माता हैं. वे स्वामी बनकर गायों की रक्षा करते हैं. वे
हमारे सभी शत्रुओं को मारें. (४)
यो धर्ता भुवनानां य उस्राणामपीच्या३ वेद नामानि गुह्या.
स कविः काव्या पुरु रूपं द्यौरिव पुष्यति नभन्तामन्यके समे.. (५)
जो वरुण भुवनों को धारण करने वाले एवं रश्मियों तथा गुहा में छिपे नामों को जानते
हैं, वे ही बुद्धिमान् वरुण द्युलोक के समान कविकृत काव्यों का पोषण करते हैं. वे सभी
शत्रुओं को समाप्त करें. (५)
यस्मिन् विश्वानि काव्या चक्रे नाभिरिव श्रिता.
त्रितं जूती सपर्यत व्रजे गावो न संयुजे युजे अश्वाँ अयुक्त नभन्तामन्यके समे.. (६)
हे मेरे सेवको! तीन स्थानों में रहने वाले वरुण की शीघ्र सेवा करो. जिस प्रकार नाभि में
पहिया स्थित रहता है उसी प्रकार सब काव्य वरुण में स्थित रहते हैं. जिस प्रकार गाय को
गोशाला में ले जाते हैं, उसी प्रकार हमारे शत्रु घोड़ों को रथ में जोड़ते हैं. वरुण सब शत्रुओं
को मारें. (६)
य आस्वत्क आशये विश्वा जातान्येषाम्.
परि धामानि मर्मृशद्वरुणस्य पुरो गये विश्वे देवा अनु व्रतं नभन्तामन्यके समे.. (७)
सारी दिशाओं को व्याप्त करने वाले वरुण चारों ओर फैले हुए शत्रुनगरों को नष्ट करते
हैं. सब देवता वरुण के रथ के आगे यज्ञकर्मों का अनुष्ठान करते हैं. वरुण सब शत्रुओं को
मारें. (७)
स समुद्रो अपीच्यस्तुरो द्यामिव रोहति नि यदासु यजुर्दधे.
स माया अर्चिना पदास्तृणान्नाकमरुहन्नभन्तामन्यके समे.. (८)
समुद्र का रूप धारण करने वाले वरुण छिपकर शीघ्र ही सूर्य के समान स्वर्ग में पहुंचते
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