ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextतदिन्द्राव आ भर येना दंसिष्ठ कृत्वने. द्विता कुत्साय शिश्रथो नि चोदय.. (२५)
हे अत्यंत दर्शनीय इंद्र! हमें अपना आश्रय दो, जिससे हम यज्ञकर्म करने वाले यजमान
की रक्षा कर सकें. तुमने दो तरह से कुत्स ऋषि की रक्षा की थी. उसी प्रकार हमारी भी रक्षा
करो. (२५)
तमु त्वा नूनमीमहे नव्यं दंसिष्ठ सन्यसे. स त्वं नो विश्वा अभिमाती: सक्षणि:.. (२६)
हे अतिशय दर्शनीय एवं स्तुतियोग्य इंद्र! इस समय हम तुमसे धन की याचना करते हैं.
तुम हमारे सभी शत्रुओं की सेनाओं को हराने वाले हो. (२६)
य ऋक्षादंहसो मुचद्यो वार्यात्सप्त सिन्धुषु. वधर्दासस्य तुविनृम्ण नीनम:.. (२७)
जो राक्षसों से उत्पन्न पाप से छुटकारा दिलाते हैं एवं जो सात नदियों के तट पर रहने
वाले यजमानों को धन देते हैं, तुम वही इंद्र हो. हे अतिशय धनी इंद्र! शत्रु राक्षसों के वध के
लिए शस्त्र नीचे फेंको. (२७)
यथा वरो सुषाम्णे सनिभ्य आवहो रयिम्. व्यश्वेभ्य: सुभगे वाजिनीवति.. (२८)
हे राजा वरु! तुमने अपने पिता राजा सुषामा के कल्याण के लिए जैसे धन दान किया
था, उसी प्रकार हमें, व्यश्व एवं उसके परिवार वालों को धन दो. हे शोभन धन एवं अन्न वाली
उषा! तुम भी हमें धन दो. (२८)
आ नार्थस्य दक्षिणा व्यश्वाँ एतु सोमिन:. स्थूरं च राध: शतवत्सहस्रवत्.. (२९)
मानव हितकारी एवं सोमरस वाले यजमान वरू की दक्षिणा व्यश्व एवं उसके पुत्रों को
प्राप्त हो. हमारे पास सौ और हजारों की संख्या में स्थूल धन आवे. (२९)
यत्त्वा पृच्छादीजान: कुहया कुहयाकृते.
एषो अपश्रितो वलो गोमतीमव तिष्ठति.. (३०)
हे उषा! जो लोग तुमसे पूछें कि राजा वरु कहां रहते हैं तो उनसे कहना—सबको
आश्रय देने वाले एवं शत्रुओं को रोकने वाले वरु गोमती के किनारे रहते हैं. (३०)
सूक्त—२५ देवता—मित्रवरुणादि
ता वां विश्वस्य गोपा देवा देवेषु यज्ञिया. ऋतावाना यजसे पूतदक्षसा.. (१)
हे सब लोक के रक्षक, दिव्य गुणयुक्त एवं देवों में यज्ञपात्र मित्र व वरुण! तुम हव्यदान
के लिए यजमान के समीप आओ. हे व्यश्व ऋषि! तुम यज्ञयुक्त एवं पवित्र शक्ति वाले मित्र व
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