ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1239 of 1855
Read in contextआ नो अश्वावदश्विना वर्तिर्यासिष्टं मधुपातमा नरा. गोमद्दस्रा हिरण्यवत्.. (१७)
हे अधिक सोम पीने वाले नेता एवं दर्शनीय अश्विनीकुमारो! हमारे घर को अश्वों, गायों
एवं स्वर्ण से युक्त बनाओ. (१७)
सुप्रावर्गं सुवीर्यं सुष्ठु वार्यमनाधृष्टं रक्षस्विना.
अस्मिन्ना वामायाने वाजिनीवसू विश्वा वामानि धीमहि.. (१८)
हम शोभनदान योग्य, सुंदर बल से युक्त, सबके द्वारा वरण करने योग्य एवं शक्तिशाली
पुरुष द्वारा भी पराजित न होने वाला धन तुमसे प्राप्त करें. हे शक्ति एवं धन वाले
अश्विनीकुमारो! तुम्हारे आने पर हम धन प्राप्त करेंगे. (१८)
सूक्त—२३ देवता—अग्नि
ईळिष्वा हि प्रतीव्यं१ यजस्व जातवेदसम्. चरिष्णुधूममगृभीतशोचिषम्.. (१)
शत्रुओं के विरोध में गमन करने वाले अग्नि की स्तुति करो. सभी उत्पन्न प्राणियों को
जानने वाले, सब ओर गतिशील धुएं वाले व राक्षसों द्वारा बाधाहीन ज्योति अग्नि की पूजा
हव्यों द्वारा करो. (१)
दामानं विश्वचर्षणेऽग्निं विश्वमनो गिरा. उत स्तुषे विष्पर्धसो रथानाम्.. (२)
हे ज्ञान-दृष्टि से सब अर्थ देने वाले विश्वमना नामक ऋषि! स्तुतिवचनों द्वारा अग्नि की
प्रशंसा करो. वे यजमान को रथ आदि संपत्ति देते हैं. (२)
येषामाबाध ऋग्मिय इषः पृक्षश्च निग्रभे. उपविदा वह्निर्विन्दते वसु.. (३)
शत्रुओं को सामने से बाधा पहुंचाने वाले एवं ऋचाओं द्वारा पूजा करने योग्य अग्नि
जिनके हव्य अन्न एवं सोमरस ग्रहण करते हैं, वे ही यजमान धन पाते हैं. (३)
उदस्य शोचिरस्थाद्दीदियुषो व्य१जरम्. तपुर्जम्भस्य सुद्युतो गणश्रियः.. (४)
भली प्रकार दीप्तिशाली, तापदाता दाढ़ वाले, शोभन दीप्तियुक्त एवं यजमानों का
आश्रय लेने वाले अग्नि का जरारहित तेज उठता है. (४)
उदु तिष्ठ स्वध्वर स्तवानो देव्या कृपा. अभिख्या भासा बृहता शुशुक्वनिः.. (५)
हे शोभन यज्ञस्तुति किए जाते हुए, चारों ओर जाती हुई प्रसिद्ध दीप्ति से युक्त एवं
ज्वलनशील अग्नि! तुम तेजस्वी ज्वालाओं के साथ बैठो. (५)
अग्ने याहि सुशस्तिभिर्हव्या जुह्वान आनुषक्. यथा दूतो बभूथ हव्यवाहनः.. (६)
ebook converter DEMO Watermarks*