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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1236 of 1855

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Page 1236

हे गाएं देने वाले इंद्र! तुम्हारे सेवक हम धनरहित न हों एवं किसी दूसरे से धन न मांगें.
हे स्वामी इंद्र! तुम हमें स्थिर धन दो. तुम्हारे दिए हुए धन को कोई नष्ट नहीं कर सकता. (१६)
इन्द्रो वा घेदियन्मघं सरस्वती वा सुभगा ददिर्वसु. त्वं वा चित्र दाशुषे.. (१७)
मुझ हव्यदाता सौभरि को क्या इंद्र ने यह धन दिया है? क्या शोभन धनवाली सरस्वती
ने मुझे संपत्ति दी है? हे राजा चित्र! यह धन क्या केवल तुम्हें दिया है? (१७)
चित्र इद्राजा राजका इदन्यके यके सरस्वतीमनु.
पर्जन्य इव ततनद्धि वृष्ट्या सहस्रमयुता ददत्.. (१८)
बादल जिस प्रकार वर्षा द्वारा धरती को सभी संपत्तियों से युक्त बनाते हैं, उसी प्रकार
राजा चित्र सरस्वती नदी के किनारे रहने वाले अन्य राजाओं को हजारों धन देकर प्रसन्न करते
हैं. (१८)
सूक्त—२२ देवता—अश्विनीकुमार
ओ त्यमह्व आ रथमद्या दंसिष्ठमूतये.
यमश्विना सुहवा रुद्रवर्तनी आ सूर्यायै तस्थथुः.. (१)
हे शोभन-आह्वान वाले एवं प्रकाशित मार्ग वाले अश्विनीकुमारो! सूर्या को पत्नीरूप में
वरण करने के लिए तुम जिस रथ पर बैठे थे, मैं अपनी रक्षा के निमित्त उसी अतिसुंदर रथ
को बुलाता हूं. (१)
पूर्वापुषं सुहवं पुरुस्पृहं भुज्युं वाजेषु पूर्व्यम्.
सचनावन्तं सुमतिभिः सोभरे विद्धेषसमनेहसम्.. (२)
हे सौभरि ऋषि! कल्याणकारिणी स्तुतियों द्वारा पूर्ववर्ती स्तोताओं को पुष्ट करने वाले,
यज्ञ में शोभन आह्वान वाले, बहुतों द्वारा अभिलषित, सबके रक्षक, युद्धों में आगे रहने वाले,
सबके द्वारा सेव्य, शत्रुओं से द्वेष करने वाले एवं पापरहित इस रथ की स्तुति करो. (२)
इह त्या पुरुभूतमा देवा नमोभिरश्विना.
अर्वाचीना स्ववसे करामहे गन्तारा दाशुषो गृहम्.. (३)
हे अनेक शत्रुओं को पराजित करने वाले, दिव्यगुणयुक्त एवं हव्यदाता यजमान के घर
जाने वाले अश्विनीकुमारो! हम इस यज्ञकर्म की रक्षा के लिए तुम्हें अपने सामने बुलायेंगे. (३)
युवो रथस्य परि चक्रमीयत ईर्मान्यद्वामिषण्यति.
अस्माँ अच्छा सुमतिर्वां शुभस्पती आ धेनुरिव धावतु.. (४)
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