ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1179 of 1855
Read in contextइमे हि ते कारवो वावशुर्धिया विप्रासो मेधसातये.
स त्वं नो मघवन्निन्द्र गिर्वणो वेनो न शृणुधी हवम्.. (१८)
हे इंद्र! यज्ञकर्म करने वाले एवं बुद्धिमान् ये यजमान यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए
तुम्हारी स्तुतियां बोलते हैं. हे धनस्वामी एवं स्तुतियोग्य इंद्र! जिस प्रकार अभिलाषी व्यक्ति
ध्यान से सुनता है, उसी प्रकार तुम हमारी पुकार सुनो. (१८)
निरिन्द्र बृहतीभ्यो वृत्रं धनुभ्यो अस्फुरः.
निरर्बुदस्य मृगयस्य मायिनो निः पर्वतस्य गा आजः.. (१९)
हे इंद्र! तुमने विशाल धनुषों द्वारा वृत्र को मारा था. तुमने मायावी अर्बुद एवं मृग को
मारा था. तुमने पर्वतों से गायों को बाहर निकाला था. (१९)
निरग्नयो रुरुचुर्निरु सूर्यो निः सोम इन्द्रियो रसः.
निरन्तरिक्षादधमो महामहिं कृषे तदिन्द्र पौंस्यम्.. (२०)
हे इंद्र! तुमने अंतरिक्ष से विशाल एवं हिंसक वृत्र को हटाकर अपनी शक्ति को प्रकाशित
किया. उस समय सभी अग्नियां, सूर्य एवं इंद्र को प्रसन्न करने वाले सोमरस प्रकाशित हुए थे.
(२०)
यं मे दुरिन्द्रो मरुतः पाकस्थामा कौरयाणः.
विश्वेषां त्मना शोभिष्ठमुपेव दिवि धावमानम्.. (२१)
इंद्र एवं मरुतों ने मुझे जो कुछ प्रदान किया, वही कुरुयान के पुत्र पाकस्थामा ने दिया.
वह धन समस्त संपत्तियों के बीच इस प्रकार शोभा पाता है, जिस प्रकार स्वर्ग में गति करता
हुआ तेजस्वी सूर्य. (२१)
रोहितं मे पाकस्थामा सुधुरं कक्ष्यप्राम्. अदाद्रायो विबोधनम्.. (२२)
पाकस्थामा ने मुझे लाल रंग वाला, शोभन पीठ वाला, लगाम से युक्त एवं भांति-भांति
की संपत्तियों का ज्ञान कराने वाला घोड़ा दिया था. (२२)
यस्मा अन्ये दश प्रति धुरं वहन्ति वह्नयः. अस्तं वयो न तुग्र्यम्.. (२३)
उस घोड़े के आगे चलने वाले दस घोड़े मुझे वहन करते हैं. इसी तरह तुग्र के पुत्र भुज्यु
को घोड़ों ने वहन किया था. (२३)
आत्मा पितुस्तनूर्वास ओजोदा अभ्यञ्जनम्.
तुरीयमिद्रोहितस्य पाकत्थामानं भोजं दातारमब्रवम्.. (२४)
अपने पिता के उपयुक्त पुत्र, निवास हेतु घर एवं ओजस्वी पदार्थ देने वाले, शत्रुओं के
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