ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1177 of 1855
Read in contextइन्द्रे ह विश्वा भुवनानि येमिर इन्द्रे सुवानास इन्दवः.. (६)
इंद्र ने अपनी शक्ति की महत्ता से द्यावा-पृथिवी का विस्तार किया है एवं सूर्य को
चमकीला बनाया है. समस्त भुवन इंद्र के नियमों में बंधे हैं. सोमरस इंद्र के अधिकार में है.
(६)
अभि त्वा पूर्वपीतय इन्द्र स्तोमेभिरायवः.
समीचीनास ऋभवः समस्वरन् रुद्रा गृणन्त पूर्व्यम्.. (७)
हे इंद्र! स्तोता लोग सबसे पहले सोमरस पीने को स्तुतियों द्वारा तुम्हें बुलाते हैं. ऋभुगण
परस्पर मिलकर तुम्हारी स्तुति करते हैं. रुद्रों ने भी तुझ प्राचीन की स्तुति की थी. (७)
अस्येदिन्द्रो वावृधे वृष्ण्यं शवो मदे सुतस्य विष्णवि.
अद्या तमस्य महिमानमायवोऽनु ष्टुवन्ति पूर्वथा.. (८)
सोमरस पीने के बाद जब सारे शरीर में नशा चढ़ता है तब इंद्र इसी यजमान की शक्ति
और ओज बढ़ाते हैं. स्तोता जिस प्रकार पहले इंद्र की महिमा की स्तुति करते थे, उसी प्रकार
आज भी करते हैं. (८)
तत्त्वा यामि सुवीर्यं तद् ब्रह्म पूर्वचित्तये.
येना यतिभ्यो भृगवे धने हिते येन प्रस्कण्वमाविथ.. (९)
हे शोभनशक्ति वाले इंद्र! मैं सबसे पहले उत्तम अन्न पाने के लिए तुमसे याचना करता
हूं. मैं तुमसे वह शक्ति एवं अन्न मांगता हूं, जिसके द्वारा तुमने यज्ञहीन लोगों का हितकारी धन
भृगु को दिया एवं प्रस्कण्व की रक्षा की. (९)
येना समुद्रमसृजो महीरपस्तदिन्द्र वृष्णि ते शवः.
सद्यः सो अस्य महिमा न सन्नशे यं क्षोणीरनुचक्रदे.. (१०)
हे इंद्र! तुम्हारा वह बल अभिलाषापूरक है, जिसने सागर का पर्याप्त जल बनाया.
तुम्हारी महिमा की सीमा नहीं है. धरती उसी महिमा के पीछे चलती है. (१०)
शग्धी न इन्द्र यत्त्वा रयिं यामि सुवीर्यम्.
शग्धि वाजाय प्रथमं सिषासते शग्धि स्तोमाय पूर्व्य.. (११)
हे इंद्र! मैं तुमसे जो शोभनबल वाला धन मांगता हूं, मुझे वह धन प्रदान करो. सेवा
करने को इच्छुक एवं हव्य धारण करने वाले यजमान को सबसे पहले धन दो. हे प्राचीन इंद्र!
स्तोता को इसके बाद धन देना. (११)
शग्धी नो अस्य यद्भू पौरमाविथ धिय इन्द्र सिषासतः.
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