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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1170 of 1855

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Page 1170

पर एवं रात के समय मेरी स्तुतियों को मुझे लौटाओ. (२९)
स्तुहि स्तुहोदेते घा ते मंहिष्ठासो मघोनाम्.
निन्दिताश्वः प्रपथी परमज्या मघस्य मेध्यातिथे.. (३०)
हे मेधातिथि ऋषि! तुम मुझ राजा आसंग की बार-बार स्तुति एवं प्रार्थना करो. मैं धन
वालों में सबसे अधिक धन देने वाला हूं. मुझ उन्नत मार्ग एवं श्रेष्ठ आयुध वाले के बल के
सामने दूसरों के घोड़े हार जाते हैं. (३०)
आ यदश्वान्वनवन्वतः श्रद्धयाहं रथे रुहम्.
उत वामस्य वसुनश्चिकेतति यो अस्ति याह्वः पशुः.. (३१)
हे मेधातिथि! जब घोड़े घास आदि आहार ले चुके, तब मैंने श्रद्धासहित उन्हें तुम्हारे रथ
में जोड़ा था. यदुवंश में उत्पन्न एवं पशुओं का स्वामी मैं सुंदर धन का दान करना जानता हूं.
(३१)
य ऋञ्जा मह्यं मामहे सह त्वचा हिरण्यया.
एष विश्वान्यभ्यस्तु सौभागासङ्गस्य स्वनद्रथः.. (३२)
जिस आसंग राजा ने मुझ मेधातिथि को स्वर्णजटित चर्मास्तरण के सहित गतिशील धन
दिया था, उस आसंग का शब्द करने वाला रथ शत्रुओं की सभी संपत्तियों को जीत ले. (३२)
अध प्लायोगिरति दासदन्यानासङ्गो अग्ने दशभिः सहस्रैः.
अधोक्षणो दश मह्यं रुशन्तो नळाइव सरसो निरतिष्ठन्.. (३३)
हे अग्नि! प्लयॊग राजा के पुत्र आसंग मुझे दस हजार गाएं दान करके सभी दान करने
वालों से आगे निकल गए. जिस प्रकार तालाब से कमल नाल निकलते हैं, उसी प्रकार आसंग
की गोशाला से अभिलाषापूरक एवं दीप्तिशाली पशु बाहर निकले. (३३)
अन्वस्य स्थूरं ददृशे पुरस्तादनस्थ ऊरुरवरम्बमाणः.
शश्वती नार्यभिचक्ष्याह सुभद्रमर्य भोजनं बिभर्षि.. (३४)
आसंग राजा के सामने की ओर बिना हड्डी वाला, लंबा एवं नीचे की ओर लटकता
हुआ स्थूल अर्थात् पुरुषेंद्रिय देखकर उसकी पत्नी ने कहा—हे आर्य! भोग का उत्तम साधन
धारण करते हो. (३४)
सूक्त—२ देवता—इंद्र
इदं वसो सुतमन्धः पिबा सुपूर्णमुदरम्. अनाभयिन्नरिमा ते.. (१)
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