ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1093 of 1855
Read in contextजिन जलों के राजा वरुण अपनी जलरूपी प्रजाओं में सत्य एवं मिथ्या को जानते हुए
मध्यम लोक में जाते हैं, वे मधुरस बरसाने वाली, दीप्तियुक्त एवं पवित्र करने वाली जलरूपी
देवियां यहां हमारी सदा रक्षा करें. (३)
यासु राजा वरुणो यासु सोमो विश्वे देवा यासूर्जं मदन्ति.
वैश्वानरो यास्वग्निः प्रविष्टस्ता देवीरिह मामवन्तु.. (४)
जिन में राजा वरुण एवं सोम रहते हैं, समस्त देव जिन में अन्न पाकर प्रमुदित होते हैं
एवं वैश्वानर अग्नि जिन में प्रविष्ट होते हैं, वे ही जलरूपी देवियां यहां हमारी रक्षा करें. (४)
सूक्त—५० देवता—मित्र आदि
आ मां मित्रावरुणेह रक्षतं कुलाययद् विश्वयन्मा न आ गन्.
अजकावं दुर्द्दशीकं तिरो दिधे मा मां पद्येन रपसा विदत्सरुः.. (१)
हे मित्र एवं वरुण! इस लोक में हमारी रक्षा करो. स्थान बनाने वाला एवं विशेषरूप से
बढ़ने वाला विष हमारी ओर न आवे. अज का दुर्द्दशीक नामक विष समाप्त हो. सांप हमारे
पैर की ध्वनि न पहचान सके. (१)
यद्विजामन्यपरुषि वन्दनं भुवदष्ठीवन्तौ परि कुल्फौ च देहत्.
अग्निष्टच्छोचन्नप बाधतामितो मा मां पद्येन रपसा विदत्सरुः.. (२)
हे दीप्तिशाली अग्नि! पेड़ों की डालियों में अनेक रूप का बंदन नामक जो विष होता है
एवं जो घुटने एवं टखने को फुला देता है, हमारे लोगों से उस विष को दूर करो. छिपकर आने
वाला सांप हमें पगध्वनि से न पहचान सके. (२)
यच्छल्मलौ भवति यन्नदीषु यदोषधीभ्यः परि जायते विषम्.
विश्वे देवा निरितस्तत्सुवन्तु मा मां पद्येन रपसा विदत्सरुः.. (३)
जो विष शाल्मली नामक वृक्ष में होता है एवं जो विष नदियों एवं ओषधियों में जन्म
लेता है, विश्वेदेव उस विष को हमसे दूर करें. छिपकर आने वाला सांप हमारी पगध्वनि न
पहचान सके. (३)
याः प्रवतो निवत उद्धत उदन्वतीरनुदकाश्च याः.
ता अस्मभ्यं पयसा पिन्वमानाः शिवा देवीरशिपदा भवन्तु सर्वा नद्यो अशिमिदा
भवन्तु.. (४)
ऊंचे देशों में, नीचे देशों में, शक्तिशाली देशों में, जल वाले देशों में एवं बिना पानी वाले
देशों में बहती हुई जो नदियां हमें जल से भिगोती हैं, वे कल्याणकारिणी नदीरूपी देवियां
ebook converter DEMO Watermarks*