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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1080 of 1855

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Page 1080

हे मरुतो! हमारी ये स्तुतियां तुम्हारे सामने जावें. ये हमारे रक्षक एवं गर्भपालक विष्णु
के पास जावें. वे स्तोता को संतान एवं अन्न दें. तुम अपने कल्याणसाधनों से हमारी सदा रक्षा
करो. (९)
सूक्त—३७ देवता—विश्वेदेव
आ वो वाहिष्ठो वहतु स्तवध्यै रथो वाजा ऋभुक्षणो अमृक्तः.
अभि त्रिपृष्ठैः सवनेषु सोमैर्मदे सुशिप्रा महभिः पृणध्वम्.. (१)
हे विस्तीर्ण तेज के आधाररूप ऋभुआे! ढोने में अधिक समर्थ, प्रशंसा के योग्य एवं
अबाधित रथ तुम्हें वहन करे. हे सुंदर ठोड़ी वाले ऋभुआे! तुम हमारे यज्ञ में आनंद के लिए
दूध, दही एवं सत्तू से मिला महान् सोम पीकर अपना पेट भरो. (१)
यूयं ह रत्नं मघवत्सु धत्थ स्वर्द्दश ऋभुक्षणो अमृक्तम्.
सं यज्ञेषु स्वधावन्तः पिबध्वं वि नो राधांसि मतिभिर्द्यध्वम्.. (२)
हे स्वर्गदर्शी ऋभुआे! हम हव्यरूप अन्न वालों को नाशरहित रत्न दो. इसके पश्चात् तुम
शक्तिशाली बनकर सोमपान करो. तुम अपनी कृपा से हमें धन दो. (२)
उवोचिथ हि मघवन्देष्वां महो अर्भस्य वसुनो विभागे.
उभा ते पूर्णा वसुना गभस्ती न सूनृता नि यमते वसव्या.. (३)
हे धनवान् इंद्र! तुम महान् एवं अल्प धन के विभाग के समय धन का सेवन करते हो.
तुम्हारे दोनों हाथ धन से पूर्ण हैं. तुम्हारी वाणी भुजाओं को नहीं रोकती. (३)
त्वमिन्द्र स्वयशा ऋभुक्षा वाजो न साधुरस्तमेष्युक्वा.
वयं नु ते दाश्वांसः स्याम ब्रह्म कृण्वन्तो हरिवो वसिष्ठाः.. (४)
हे असाधारण यशस्वी, ऋभुओं के स्वामी एवं यज्ञसाधक इंद्र! तुम अन्न के समान स्तोता
के घर जाओ. हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी इंद्र! हम वसिष्ठपुत्र तुम्हें हव्य देते हुए तुम्हारी
स्तुति करें. (४)
सनितासि प्रवतो दाशुषे चिद्याभिर्विवेषो हर्यश्व धीभिः.
ववन्मा नु ते युज्याभिरूती कदा न इन्द्र राय आ दशस्येः.. (५)
हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी एवं हमारी स्तुतियों से व्याप्त इंद्र! तुम हव्यदाता यजमान
को पर्याप्त धन देते हो. हे इंद्र! तुम हमें धन कब दोगे? आज हम तुम्हारे योग्य रक्षण से युक्त
हों. (५)
वासयसीव वेधसस्त्वं नः कदा न इन्द्र वचसो बुबोधः.