Skip to content
SarvaKosh
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1022 of 1855

Read in context
Page 1022

सप्तम मंडल
सूक्त—१ देवता—अग्नि
अग्निं नरो दीधितिभिररण्योर्हस्तच्युती जनयन्त प्रशस्तम्.
दूरेदृशं गृहपतिमथर्युम्.. (१)
यज्ञ के नेता ऋत्विज् प्रशंसायोग्य, दूर से दिखाई देने वाले, गृहपति एवं गतिशील अग्नि
को हाथों की गति एवं उंगलियों की सहायता से अरणि से उत्पन्न करते हैं. (१)
तमग्निमस्ते वसवो नृण्वन्त्सुप्रतिचक्षमवसे कुतश्चित्.
दक्षाय्यो यो दम आस नित्यः.. (२)
जो अग्नि घर में पूजनीय एवं नित्य थे, उन्हीं शोभनदर्शन वाले अग्नि को सभी भयों से
बचाने के लिए वसिष्ठ पुत्रों ने घर में रखा. (२)
प्रेद्धो अग्ने दीदिहि पुरो नोऽजस्रया सूर्त्या यविष्ठ.
त्वां शश्वन्त उप यन्ति वाजाः.. (३)
हे अतिशय युवा अग्नि! तुम भली प्रकार प्रज्वलित होकर अपनी गतिशील ज्वाला के
साथ हमारे कल्याण के लिए यज्ञशाला में चमको. बहुत से अन्न तुम्हारे पास जाते हैं. (३)
प्र ते अग्नयोऽग्निभ्यो वरं निः सुवीरासः शोशुचन्त द्युमन्तः.
यत्रा नरः समासते सुजाताः.. (४)
शोभनजन्म वाले ऋत्विज् जहां बैठते हैं, वहां अग्नि लौकिक अग्नियों की अपेक्षा
कल्याणकारी, संतान देने वाले एवं अधिक दीप्तिशाली होकर चमकते हैं. (४)
दा नो अग्ने धिया रयिं सुवीरं स्वपत्यं सहस्य प्रशस्तम्.
न यं यावा तरति यातुमावान्.. (५)
हे शत्रुओं को हराने में कुशल अग्नि! हमारी स्तुतियां सुनकर हमें ऐसा कल्याणकर,
संतान वाला, शोभन पुत्र-पौत्र वाला एवं श्रेष्ठ धन दो, जिसे हिंसक शत्रु बाधित न कर सकें.
(५)
ebook converter DEMO Watermarks*