ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1011 of 1855
Read in contextसरल-गति, शत्रु-पराभवकारी तथा कामवर्षी सोमरस को प्रस्तुत करते हैं, उस समय तुम घर
देने के लिए आते हो और तुम्हारा दिया हुआ घर नष्ट नहीं होता. (११)
सूक्त—६८ देवता—इंद्र व वरुण
श्रुष्टी वां यज्ञ उद्यतः सजोषा मनुष्वद् वृक्तबर्हिषो यजध्यै.
आ य इन्द्रावरुणाविषे अद्य महे सुम्नाय मह आववर्तत्.. (१)
हे महान् इंद्र व वरुण! आज यज्ञ में ऋत्विजों द्वारा तुम्हारे निमित्त वही सोमरस तैयार
किया गया है, जो मनु के समान यजमान द्वारा कुश बिछाने के पश्चात् महान् एवं सुख के लिए
किया जाता है. (१)
ता हि श्रेष्ठा देवताता तुजा शूराणां शविष्ठा ता हि भूतम्.
मघोनां मंहिष्ठा तुविशुष्म ऋतेन वृत्रतुरा सर्वसेना.. (२)
हे इंद्र व वरुण! तुम श्रेष्ठ, यज्ञ में धन देने वाले एवं शूरों में अतिशय शक्तिशाली हो. तुम
दानकर्त्ताओं में अति महान्, अतिशय बलयुक्त, सत्य द्वारा शत्रुओं की हिंसा करने वाले एवं
सभी सेनाओं के स्वामी हो. (२)
ता गृणीहि नमस्येभिः शूषैः सुम्नेभिरिन्द्रावरुणा चकाना.
वज्रेणान्यः शवसा हन्ति वृत्रं सिषक्त्यन्यो वृजनेषु विप्रः.. (३)
हे भरद्वाज! स्तुतियोग्य, शक्तिशालीयों व सुखी लोगों द्वारा प्रशंसित इंद्र एवं वरुण की
स्तुति करो. इन में एक वज्र द्वारा वृत्र को मारता है और दूसरा बुद्धिमान् शक्ति द्वारा स्तोताओं
के उपद्रवों में रक्षक बनता है. (३)
ग्नाश्च यन्नरश्च वावृधन्त विश्वे देवासो नरां स्वगूर्ताः.
प्रैभ्य इन्द्रावरुणा महित्वा द्यौश्च पृथिवि भूतमूर्वी.. (४)
हे इंद्र एवं वरुण! मनुष्यों में स्त्रियां और पुरुष एवं सब देव स्वयं तत्पर होकर जब
स्तुतियों द्वारा तुम्हारी वृद्धि करते हैं, तब तुम इन स्तोताओं के स्वामी बनो. हे द्यावा-पृथ्वी!
तुम भी इनके स्वामी बनो. (४)
स इत्सुदानुः स्ववाँ ऋतावेन्द्रा यो वां वरुण दाशति त्मन्.
इषा स द्विषस्तरेद्दास्वान्वंसद रयिं रयिवतश्च जनान्.. (५)
हे इंद्र एवं वरुण! जो यजमान अपने आप तुम्हें हव्य देता है, वह शोभनदान वाला,
धनवान् एवं यज्ञकर्त्ता बने. ऐसा दाता जयशील शत्रु से जीतता है एवं धन के साथ
संपत्तिशाली-पुत्र प्राप्त करता है. (५)
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