ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1008 of 1855
Read in contextपूरी कर लेते हैं. जो तिरोहित, गतिशील एवं महान् हैं, उन्हीं उग्र-मरुत को शोभनहवि धारण
करने वाला यजमान क्रोधरहित करता है. (५)
त इदुग्राः शवसा धृष्णुषेणा उभे युजन्त रोदसी सुमेके.
अध स्मैषु रोदसी स्वशोचिरामवत्सु तस्थौ न रोकः.. (६)
उग्र एवं शक्तिशाली मरुद्गण शक्तिशाली-सेवा को शोभनरूप वाले धरती-आकाश से
मिलाते हैं. रुद्रपत्नी मध्यमा वाक् मरुतों में अपनी दीप्ति के साथ रहती है. शक्तिशाली मरुतों
का कोई भी बाधक नहीं है. (६)
अनेनो वो मरुतो यामो अस्तवश्वश्चिद्धामजत्यरथीः.
अनवसो अनभीशू रजस्तूर्वि रोदसी पथ्या याति साधन्.. (७)
हे मरुतो! तुम्हारा रथ पापरहित हो. स्तोता सारथि न होने पर भी जिस रथ को चलाता
है, वह बिना घोड़ों वाला, भोजनशून्य एवं पाशरहित होकर भी जल का प्रेरक एवं स्तोताओं
की अभिलाषा पूर्ण करने वाला बनकर स्वर्ग, धरती एवं आकाश में चलता है. (७)
नास्य वर्ता न तरुता न्वस्ति मरुतो यमवथ वाजसातौ.
तोके वा गोषु तनये यमप्सु स व्रजं दर्ता पार्ये अध द्योः.. (८)
हे मरुतो! युद्ध में तुम जिसकी रक्षा करते हो, उसका न कोई प्रेरक होता है और न कोई
हिंसक. तुम जिसके पुत्रों, पौत्रों, गायों एवं जल की रक्षा करते हो, वह युद्ध में तेजस्वी शत्रु
की भी गायों को नष्ट करता है. (८)
प्र चित्रमर्कं गृणते तुराय मारुताय स्वतवसे भरध्वम्.
य सहांसि सहसा सहन्ते रेजते अग्ने पृथिवी मखेभ्यः.. (९)
हे अग्नि! शब्द करने वाले, शीघ्रगति वाले एवं अपनी शक्ति वाले मरुतों को दर्शनीय
हवि दो. वे अपने बल से शत्रुओं का बल पराजित करते हैं. आदरणीय मरुतों से पृथ्वी कांपती
है. (९)
त्विषीमन्तो अध्वरस्येव दिद्युत्तृषुच्यवसो जुह्वो३ नाग्नेः.
अर्चत्रयो धुनयो न वीरा भ्राजज्जन्मानो मरुतो अधृष्टाः.. (१०)
यज्ञ के समान प्रकाश वाले, शीघ्रगामी, आग की लपटों के समान दीप्तिशाली एवं
शत्रुओं को कंपाने वाले वीरों के समान आदरणीय मरुद्गण तेजस्वी शरीर वाले तथा
अपराजेय हैं. (१०)
तं वृधन्तं मारुतं भ्राजदृष्टिं रुद्रस्य सूनुं हवसा विवासे.
दिवः शर्धाय शुचयो मनीषा गिरयो नाप उग्रा अस्पृध्रन्.. (११)
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