रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
DevanagariHindipublished362 pages
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के मुख को ढक्कन से तथा नालीप्रवेशजन्य छिद्रों को कपडमिट्टि द्वारा बन्द कर के सुखा कर युक्ति से चूल्हे पर पारद वाले घट को स्थापित कर के अग्नि जला देवें। अग्नि जलते समय चूल्हे के नीचे स्थित घट पर एक लोटे या पात्र के द्वारा शीतल जल डालते रहना चाहिए। इस तरह चूल्हे पर स्थित घट के अन्दर से पारद अग्नि के ताप के कारण उड कर नीचे वाले घट के जल में नलिका मार्ग से हो कर एकत्रित होता रहता है। वार्त्तिककारों ने इस को तिर्यक्पातन यन्त्र कहा है।