रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextअथवा—
अन्तःकृतरसालेपताम्रपात्रमुखस्य च ।
लिप्त्वा मृल्लवणेनैव सन्धि भाण्डतलस्य च ॥ १ ॥
तद्भाण्डं पटुनाऽऽपूर्य्य क्षारैरर्धा पूर्व्ववत् पचेत् ।
एवं लवणयन्त्रं स्याद् रसकर्म्मणि शस्यते ॥ २ ॥— रसरत्नसमुच्चयः ।
एक आतसी शीशी जिसका नीचे का भाग (पेंदी) चौड़ा हो तथा लम्बी और सङ्कुचित नलिका हो, लेकर उस की नलिका में एक पतली लकड़ी डाल कर शीशी को उल्टी करदें। फिर इस लकड़ी को किसी टेबुल के सहारे दृढ़ बांध दें। फिर हण्डिका में २४ घण्टे तक गली हुई मुल्तानी (चिकनी) मिट्टी का आतसी शीशी के पृष्ठ (पीठ) भाग पर पतला एक लेप कर के उसी मिट्टी के घोल में भींगी हुई वस्त्र की पट्टी का प्रलेप कर के सुखा लेवें। फिर सूख जाने पर दूसरी पट्टी का लेप करदें। इस तरह सात बार लेप कर के सुखा लेवें। फिर उस आतसी शीशी के चार भागों में से तीन भागों को कज्जली से भर दें। फिर एक लोहे या मिट्टी की नांद (टब) को बालुका (रेत) से भर कर उस बालुका के मध्य में आतसी शीशी को गले तक गाड दें। फिर उस नांद के मुख पर शराव ढक कर के सन्धि बन्धन कर दें। फिर इस यन्त्र को भट्टी पर चढ़ा कर अग्नि प्रज्वलित कर दें तथा हण्डिका (यन्त्र) के मुख पर स्थित शराव के अन्दर तृण भर दें। स्थान को बालुका, रेत अथवा क्षार या लवण से भर कर यन्त्र को चूल्हे पर चढ़ा कर पाक करना चाहिए। इस को बालुका यन्त्र या लवण यन्त्र कहते हैं।