रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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लोह, अभ्रक, रत्न आदि अनेक पदार्थों के सत्त्वों को निकालने के लिये तथा निकले हुए सत्त्वों की शुद्धि करने के लिये अनेक स्वरूप की कोष्ठिकाएं शास्त्र में कही गई हैं, उनके लक्षण नीचे लिखे जाते हैं ॥ ३२ ॥
अथ अङ्गारकोष्ठी—
राजहस्तसमुत्सेधो तदर्द्धायामविस्तरा ।
चतुरस्रा च कुड्येन वेष्टिता मृण्मयेन च ॥ ३३ ॥
एकभित्तौ चरेद्द्वारं वितस्त्याभोगसंयुतम् ।
द्वारं सार्धवितस्त्या च सम्मितं सुदृढं शुभम् ॥ ३४ ॥
देहल्यधो विधातव्यं धमनाय यथोचितम् ।
प्रादेशप्रमिता भित्तिरुत्तरङ्गस्य चोर्ध्वतः ॥ ३५ ॥
द्वारं चोपरि कर्त्तव्यं प्रादेशप्रमितं खलु ।
ततश्चेष्टिकया रुद्ध्वा द्वारसंधिं विलिप्य च ॥ ३६ ॥
शिखित्रैस्तां समापूर्य्य धमेद्भस्त्राद्वयेन च ।
शिखित्रान् धमनद्रव्यमूर्ध्वद्वारेण निक्षिपेत् ॥ ३७ ॥
सत्त्वपातनगोलांश्च पञ्च पञ्च पुनः पुनः ।
भवेदङ्गारकोष्ठीयं खराणां सत्त्वपातिनी ॥ ३८ ॥
राजहस्त (साधारण मनुष्य के हस्त से सवाया हस्त राजहस्त मानना चाहिए, प्रायः साधारण मनुष्य का हस्त २४ अङ्गुल लम्बा होता है और राजहस्त तीस अङ्गुल लम्बा माना जाता है, राजहस्त ही को प्रायः गजहस्त कहते हैं) के समान ऊंची और उसकी आधी अर्थात् पन्द्रह अङ्गुल चौड़ो तथा चार मिट्टी की भित्तियों से युक्त एक चोकोर कोष्ठी बनाकर उसकी एक भित्ति में बीच के भाग से कुछ ऊपरी भाग में एक बालिस्त (बेंत) या डेढ बालिस्त चौड़ा द्वार बनावें, तथा देहली के नीचे धौंकनी के द्वारा फूंकने के लिये उचित द्वार बनावे, फिर उस कोष्ठी के ऊपरी भाग में प्रादेश (१) के समान मोटी भित्ति की छत बनाकर प्रादेश के समान चौड़ा एक द्वार छत में बनाकर ईंट से उसे ढककर सन्धिबन्धन कर देवे, फिर ऊपर के भाग में स्थित भित्ति के द्वार से कोयले तथा सत्त्वपातन
(१) अङ्गुष्ठ तथा तर्जनी अङ्गुली के मध्य के अवकाश को प्रादेश कहते हैं यथा—"अङ्गुष्ठस्य प्रदेशिन्या न्यासः प्रादेश उच्यते" ।