रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context२७० रसरत्नसमुच्चये—
जिस तरह पुष्प डण्ठल के साथ अच्छी तरह लगा रहता है उसी तरह अच्छी तरह से लगा देनी चाहिए। इसको वृन्ताकमूषा कहते हैं। इसके द्वारा कोमल खर्पर जैसे पदार्थों का सत्त्व निकाला जाता है ॥ २३-२४ ॥
अथ गोस्तनीमूषा—
मूषा या गोस्तनाकारा शिखायुक्तपिधानका ।
सत्त्वानां द्रावणे शुद्धौ मूषा सा गोस्तनी भवेत् ॥ २५ ॥
जिस मूषा की आकृति (बनावट) गाय के स्तन के समान हो और उसका ढक्कन शिखा के समान नीचे से मोटा और ऊपर से पतला हो ऐसी मूषा को गोस्तनीमूषा कहते हैं। यह मूषा सत्त्वों के द्रवण करने और उनको शोधन करने के लिए उत्तम होती है ॥ २५ ॥
अथ मल्लमूषा—
निर्दिष्टा मल्लमूषा या मल्लद्वितयसम्पुटात् ।
पर्पट्यादिरसादीनां स्वेदनाय प्रकीर्तिता ॥ २६ ॥
दो मिट्टी के सकोरों को परस्पर जोड कर कपड़मिट्टी से दोनों के मुख की सन्धि को बन्द कर देते हैं। इसको मल्लमूषा कहते हैं। यह मूषा पर्पटी तथा अन्य रसों के स्वेदन करने के लिये बनाई जाती है ॥ २६ ॥
अथ पक्वमूषा—
कुलालभाण्डरूपा या दृढा च परिपाचिता ।
पक्वमूषेति सा प्रोक्ता पोट्टल्यादि विपाचने ॥ २७ ॥
कुम्हार के बनाये हुए भाण्ड (या उसके घट के लिये बनाये हुये भिन्न २ कपाल के) के समान आकृति की दृढ मूषा बना कर उसको अग्नि में पका लेनी चाहिए। इस को पक्वमूषा कहते हैं। यह मूषा हिरण्यगर्भ या रसगर्भ पोट्टली आदि के पकाने में काम आती है ॥ २७ ॥
अथ गोलमूषा—
निर्वक्रगोलकाकारा पुटनद्रव्यगर्भिणी ।
गोलमूषेति सा प्रोक्ता सत्त्वरद्रवरोधिनी ॥ २८ ॥
मल्लमूषा के समान मूषा के दो गोल भाग पृथक् २ बनाकर उन में से एक में पुट देने योग्य पदार्थों को भर कर दोनों को परस्पर जोड़कर अच्छी तरह (मुख