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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

DevanagariHindipublished362 pages

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२५४ रसरत्नसमुच्चये—

अथ प्रकारान्तरम्—

अन्तः कृतरसालेपताम्रपात्रमुखस्य च ।
लिप्त्वा मृल्लवणेनैव सन्धिं भाण्डतलस्य च ॥ ३८ ॥
तद्भाण्डं पटुनाऽऽपूर्य क्षारैर्वा पूर्ववत्पचेत् ।
एवं लवणयन्त्रं स्याद्रसकर्मणि शस्यते ॥ ३९ ॥

किसी एक ताम्र के पात्र के अन्दर औषधों के साथ पारद को घोट कर लेप करके उस पात्र को सुखाकर एक मिट्टी के अन्दर औंधा करके रख दें । फिर उस ताम्रपात्र के मुख को उस भाण्ड या कूण्डे की तली के साथ मिट्टी तथा लवण की पिष्ठी बनाकर उससे उन दोनों का सन्धिवन्धन करना चाहिए । फिर उस भाण्ड तथा ताम्र पात्र को वालुका अथवा क्षार या लवण से भर कर पकाना चाहिए । इसको भी लवणयंत्र कहते हैं । इस तरह का लवणयंत्र रसकर्म में अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ ३८-३९ ॥

अथ नालिकायन्त्रम्—

लोहनालगतं सूतं भाण्डे लवणपूरिते ।
निरुद्धं विपचेत्प्राग्वन्नालिकायन्त्रमीरितम् ॥ ४० ॥

एक लोह की नली बनवाकर उसमें उपयुक्त औषधों के साथ पारद को भर कर उसका मुख बन्द कर के लवण यंत्र के मध्य में गाड़ दें । फिर लवण यंत्र के मुख को सकोरे द्वारा कपड़मिट्टी से बन्द करके पकाना चाहिए । इसको नालिकायंत्र कहते हैं ॥ ४० ॥

अथ भूधरयन्त्रम्—

वालुकागूढसर्वाङ्गां गर्ते मूषां रसान्विताम् ।
दीप्तोत्पलैः संवृणुयाद्यन्त्रं तद्भूधराह्वयम् ॥ ४१ ॥

पृथ्वी में एक हाथ गहरा गड्ढा खोद कर उसको वालुका से आधा भर दें, फिर उस वालुका पर औषध युक्त पारद से भरी हुई मूषा रख दें । मूषाका मुख बन्द कर के ऊपर से उस मूषा को रेत से ढक कर उस पर जंगली उपलों को जला देना चाहिए, इसको भूधर यंत्र कहते हैं ॥ ४१ ॥

अथ पुटयन्त्रम्—

शरावसम्पुटान्तःस्थं करीषेष्वग्निमानवित् ।
पचेच्चुल्ल्यां द्वियामं वा रसं तत्पुटयन्त्रकम् ॥ ४२ ॥