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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

DevanagariHindipublished362 pages

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२५२ रसरत्नसमुच्चये—

लोणस्य विंशतिर्भागा भाग एकस्तु गुग्गुलाः ॥ २८ ॥
सुश्लक्ष्णं पेषयित्वा तु वारं वारं पुनः पुनः ।
मूषालेपं दृढं कृत्वा लवणाङ्घ्रीमृदम्बुभिः ॥ २९ ॥
कर्षेत्तुषाग्निना भूमौ स्वेदयेन्मृदु मानवित् ।
अहोरात्रं त्रिरात्रं वा रसेन्द्रो भस्मतां व्रजेत् ॥ ३० ॥

नष्टपिष्ट किये हुए पारद की भस्म बनाने के लिये गर्भ यंत्र का वर्णन करते हैं। चार अङ्गुल लम्बी और तीन अङ्गुल चौड़ी मिट्टी की गोल मुखकी दृढ मूषा बनवानी चाहिए, फिर बीस भाग नमक और एक भाग गुग्गुल, दोनों को नमक से आधे भाग मिट्टी तथा जल के साथ घोटकर उस मूषा में लेप करना चाहिए, फिर उस मूषा के अन्दर पारद डालकर उसका मुख बन्दकर देवे। सूखनेके बाद मूषा को पृथ्वी में गाड़कर उसके ऊपर जंगली उपलों की अग्नि देकर एक दिन तक अथवा तीन दिन तक स्वेदन करना चाहिए। प्रायः अग्नि यदि तीन दिन तक देना हो तो मृदु अग्नि जलावे। और यदि एक दिन रात में पाक करना हो तो तीव्र आंच देवे, इस को गर्भयंत्र कहते हैं ॥ २७-३० ॥

अथ हंसपाकयन्त्रम्—

खर्परं सिकतापूर्णं कृत्वा तस्योपरिन्यसेत् ।
अपरं खर्परं तत्र शनैर्मृद्वग्निना पचेत् ॥ ३१ ॥
पञ्चक्षारैस्तथा मूत्रैर्लवणं च विडं ततः ।
हंसपाकं समाख्यातं यन्त्रं तद्वार्त्तिकोत्तमैः ॥ ३२ ॥

एक मिट्टीके खर्पर (कुण्डा) को वालुका (रेते) से भरकर ऊपरसे दूसरा खर्पर रख कर ढक देते हैं, और इस में पारद को (१)पांचोक्षार, आठों (२)प्रकार के मूत्र तथा लवण विशेष कर विड़लवण इत्यादि पदार्थों के साथ पाक करते हैं। इस यंत्र को रसपरिभाषाकार पण्डितों ने हंसपाक यन्त्र कहा है ॥ ३१-३२ ॥


( १ ) यवमुष्ककसर्जानीं पलाशतिलयोस्तथा ।
क्षारैस्तु पञ्चभिः प्रोक्तः पञ्चक्षाराभिधोगणः ॥
( २ ) सैरिभाजाविकरभगोखरद्विपवाजिनाम् ।
मूत्राणीति भिषग्वर्यै र्मूत्राष्टकमुदाहृतम् ॥