रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
Page 336 of 362
Read in context१४६ रसरत्नसमुच्चये—
नवमोऽध्यायः ।
अथ यन्त्राणि—
अथ यन्त्राणि वक्ष्यन्ते रसतन्त्राण्यशेषतः ।
समालोच्य समासेन सोमदेवेन साम्प्रतम् ॥ १ ॥
श्री सोमदेव ने सम्पूर्ण रसशास्त्र के भिन्न २ तन्त्रों का अवलोकन करके जो यन्त्र बनाने की विधि कही है, उस विधि से प्रयुक्त होने वाले यन्त्रों का इस स्थान पर संक्षेप से वर्णन किया जाता है ॥ १ ॥
यन्त्रशब्दनिरुक्तिः—
स्वेदादिकर्मनिर्मातुं वार्तिकेन्द्रैः प्रयत्नतः ।
यन्त्र्यते पारदो यस्मात्तस्माद्यन्त्रमिति स्मृतम् ॥ २ ॥
पारद का स्वेदन, मूर्च्छन, मर्दन आदि अनेक संस्कार करने के लिये जिस उपाय से रस को नियन्त्रित किया जाता है उसको रसपरिभाषाकारक आचार्यों ने यन्त्र कहा है ॥ २ ॥
अथ दोलायन्त्रम्—
द्रवद्रव्येण भाण्डस्य पूरितार्धोदकस्य च ।
मुखस्योभयतो द्वारद्वयं कृत्वा प्रयत्नतः ॥ ३ ॥
तयोस्तु निक्षिपेद्दण्डं तन्मध्ये रसपोटलीम् ।
बद्ध्वा तु स्वेदयेदेतद्दोलायन्त्रमिति स्मृतम् ॥ ४ ॥
काञ्जी, निम्बूस्वरस, क्षार, या जयन्ती आदि स्वेदन करने में उपयुक्त ओषधियों के क्वाथ या स्वरस से एक मिट्टी की हण्डिका को आधी भर करके उस हण्डिका के किनारों पर एक दूसरे के सामने दो छिद्र युक्ति से बनाकर उन में एक लकड़ी लगा देना चाहिये फिर उस लकड़ी के बीच में पारद की पोटली या अन्य स्वेदनीय धातु उपधातु तथा रत्नों की पोटली बांध कर उस द्रव में लटका देते हैं, फिर अग्नि जलाकर चूल्हे पर हण्डिका को रखकर उस पोटली के अन्दर स्थित पदार्थ को स्वेदित करते हैं, इस को दोलायन्त्र कहते हैं । अर्थात् रसादिक की पोटली डोले (झूले) के समान दण्ड में बांधकर लटका दी जाती है, अतः दोलायन्त्र कहा गया है ॥ ३-४ ॥