Skip to content
SarvaKosh
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished362 pages

Page 334 of 362

Read in context
Page 334

२४४ | रसरत्नसमुच्चये—

शब्दवेधलक्षणम्—

मुखस्थितरसेनाल्पलोहस्य धमनात्खलु ।
स्वर्णरूप्यत्वजननं शब्दवेधः स कीर्त्तितः ॥ ९५ ॥

किसी लौह आदि धातु के कुछ भाग को अग्नि पर विद्रुत कर उसको मुख में रखे हुए पारद ( वेधसमर्थपारद गोली ) से एकनली के द्वारा फूंक के जोर से धमने से वह धातु स्वर्ण या रौप्य के रूप में परिवर्तित हो जाती है इसको शब्दवेध कहते हैं ॥ ९५ ॥


उद्घाटनलक्षणम्—

सिद्धद्रव्यस्य सूतेन कालुष्यादिनिवारणम् ।
प्रकाशनं च वर्णस्य तदुद्घाटनमीरितम् ॥ ९६ ॥

मृत किये हुए ( भस्म किये हुए ) लोहादिक द्रव्यों की कलुषता (मालिन्य) विशेष रूप से सिद्ध पारद के द्वारा दूर की जाती है और उस मृत लोहादिक के रङ्ग को भी पारद उत्कृष्ट करता है इस को उद्घाटन कहते हैं ॥ ९६ ॥


स्वेदनलक्षणम्—

क्षाराम्लैरौषधैः सार्द्धं भाण्डं रुद्ध्वाऽतियत्नतः ।
भूमौ निखन्यते यत्नात्स्वेदनं सम्प्रकीर्त्तितम् ॥ ९७ ॥

क्षार, अम्ल, ( काञ्जी ) तथा और भी अन्य औषधियों को भाण्ड में भरकर उसमें पारद या अन्य लोह इत्यादि धातु को रख करके भाण्ड का मुख सकोरे से ढक कर कपड़ मिट्टि करके बन्द करदेते हैं फिर उस भाण्ड को पृथ्विी में गाड़ देते हैं, इस को भी स्वेदन यन्त्र कहते हैं । क्योंकि भूमि की आन्तरिक उष्णता से स्वेदन की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है ॥ ९७ ॥


संन्यासलक्षणम् ।

रसस्यौषधयुक्तस्य भाण्डरुद्धस्य यत्नतः ।
मन्दाग्नियुतचुल्ल्यन्तः क्षेपः संन्यास उच्यते ॥ ९८ ॥

किसी भाण्ड में क्षार तथा अम्ल भरकर उसमें पारद रख देते हैं । फिर उस भाण्ड के मुख को कपड़मिट्टी से बन्द कर के मन्द २ आंच वाले चूल्हे के उपर रख देते हैं उसको सन्यास कहते हैं ॥ ९८ ॥