रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextअष्टमोऽध्यायः । २२९
अथ निर्वापणम्—
साध्यलोहेऽन्यलोहं चेत्प्रक्षिप्तं वङ्कनालतः ।
निर्वापणं तु तत्प्रोक्तं वैद्यैर्निर्वाहिणं खलु ॥ २५ ॥
अग्नि में विद्रुत हुई धातु में अन्य धातु को विद्रुत कर वङ्कनाल द्वारा डालने को निर्वापण कहते हैं और उसी का पर्याय वैद्य जनोने निर्वाहिण भी कहा है॥ २५॥
निर्वापणद्रव्यमात्रा—
क्षिपेन्निर्वापणं द्रव्यं निर्वाह्ये समभागिकम् ।
आवाह्यं वापनीये च भागे दृष्टे च दृष्टवत् ॥ २६ ॥
साध्य लोह में निर्वापण द्रव्य की मात्रा साध्य लोह के बराबर ही होनी चाहिए अथवा जैसी निर्वापण द्रव्य की मात्रा गुरुपरम्परा से सीखी या देखी हो उसी के अनुसार कार्य करना चाहिए ॥ २६ ॥
अथ वारितरलोहलक्षणम्—
मृतं तरति यत्तोये लोहं वारितरं हि तत् ॥ २७ ॥
जो धातु फूंकने के पश्चात् अर्थात् उस धातु की भस्म जल पर तैरती रहे उसमें डूबे नहीं उसको वारितरभस्म या लोह कहते हैं ॥ २७ ॥
मृतलोहलक्षणम्—
अङ्गुष्ठतर्जनीघृष्टं यत्तद्रेखान्तरे विशेत् ।
मृतलोहं तदुद्दिष्टं रेखापूर्णाभिधानतः ॥ २८ ॥
किसी भी लोह (सप्तलोह) की भस्म को अङ्गुष्ठ तथा तर्जनी अङ्गुली के बीच में लेकर घर्षित करने से यदि वह भस्म उन दोनों की रेखाओं में प्रविष्ट हो जाय तथा नीचे नहीं गिरे तब उस धातु की भस्म को मृतलोह अथवा रेखापूर्ण नाम से कहते हैं ॥ ॥ २८ ॥
अपुनर्भव लक्षणम्—
गुडगुञ्जासुखस्पर्श मध्वाज्यैः सह योजितम् ।
नायाति प्रकृतिं ध्मानादपुनर्भवमुच्यते ॥ २९ ॥
गुड़, गुञ्जाचूर्ण, सुहागा, शहद, घृत, इनके साथ किसी भी धातु की भस्म को मिलाकर अग्नि में फूंकने से यदि वह अपने स्वरूप को धारण नहीं करे तब उसको अपुनर्भव भस्म कहते हैं ॥ २९ ॥