रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextषष्ठोऽध्यायः । | २०३
पक्ष तक गाड़ देना चाहिए । फिर इस कल्क को दो काष्ठ के पट्टों के बीच में दबाकर तैल निकालना चाहिए ॥ २४३ ॥
इति श्रीकृष्णान्त्मजेन पण्डितप्रवरेण श्रीअम्बिकादत्तशास्त्रिणा विरचितायां
रसरत्नसमुच्चयस्य रत्नोज्ज्वलाख्य-भाषाटीकायां
लोहशोधनमारणादिनिरूपणं नाम पञ्चमोऽध्यायः।
अथ षष्ठोऽध्यायः।
शिष्योपनयननिरूपणम्—
अथ क्रमयुक्तशास्त्रम्—
रसशास्त्राणि सर्वाणि समालोच्य यथाक्रमम् ।
साधकानां हितार्थाय प्रकटीक्रियतेऽधुना ॥ १ ॥
यथाक्रम से सब रस के शास्त्रों का उत्तम प्रकार से अवलोकन कर रस शास्त्र को जानने की इच्छा वाले साधकों के हित के लिये रसशास्त्र का वर्णन किया जाता है॥१॥
शास्त्रक्रमयोः परस्परापेक्षा—
न क्रमेण विना शास्त्रं न शास्त्रेण विना क्रमः ।
शास्त्रं क्रमयुतं ज्ञात्वा यः करोति स सिद्धिभाक् ॥ २ ॥
जिस शास्त्र में पौर्वापर्य्यरूप क्रम नहीं रहता है वह शास्त्र उत्तम शास्त्र नहीं है और शास्त्रप्रमाण से शून्य क्रम भी उत्तम क्रम नहीं है, इस कारण जो साधक क्रमानुसार शास्त्र को जान कर रसादिकर्म करने में प्रवृत्त होता है वही सिद्धि को प्राप्त करता है ॥ २ ॥
रसविद्यागुरुः—
आचार्यो ज्ञानवान्दक्षो रसशास्त्रविशारदः ।
मन्त्रसिद्धो महावीरो निश्चलः शिववत्सलः ॥ ३ ॥
देवीभक्तः सदा धीरो देवतायागतत्परः ।
सर्वाम्नायविशेषज्ञः कुशलो रसकर्मणि ।