रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context१९० रसरत्नसमुच्चये—
टेढ़े आकार वाले बने हुए चूल्हे पर एक घड़े को तिर्यक् मुख करके रख दें, फिर उस घड़े के मुख को छोड़कर सर्वाङ्ग पर चिकनी मिट्टी का लेप कर दें, यही आष्ट्रसंज्ञकयन्त्र कहलाता है। इस यन्त्र में २० पल ( १ सेर ) शुद्ध सीसा डाल-कर नीचे तेज आंच लगानी चाहिए। जब सीस द्रुत हो जाय तब उस यन्त्र में एक कर्ष श्रेष्ठ तथा शुद्ध पारद डालकर लोहे की कलच्छु से घोटें, कुछ देर बाद उस यन्त्र में अर्जुन वृक्ष की छाल, बहेड़े की छाल, अमलतास या शाकविशेष, दाड़िम ( अनार ) और अपामार्ग, इन सबका एक २ पल ( ४ तोला ) क्षार डाल कर तीव्र अग्नि से २१ दिन तक पकाना चाहिए। साथ में लोहे की कलच्छू द्वारा दोनों हाथों से खूब घोटते रहना चाहिए। इस विधि से नाग की लाल या कबूतर के वर्ण ( धूसर वर्ण ) के समान भस्म हो जाती है। इस विधि से नाग सब दोषों से रहित होकर निरुत्थ भस्म के रूप में अत्यन्त गुणकारक रसायन हो जाता है ॥ १७३-१७८ ॥
मतान्तरम्—
हतमुत्थापितं सीसं दशवारेण सिध्यति ।
तन्मृतं सीसकं सर्वदोषमुक्तं रसायनम् ॥ १७४ ॥
सीस की उपर्युक्तविधि से भस्म बनाकर ऊर्ध्वपातनयन्त्र में उसका उत्था-पन करें, इस तरह दस बार करने से सीस की सब दोषों से रहित रसायन के उपयोगी निरुत्थ भस्म हो जाती है ॥ १७९ ॥
अथ नागस्य निरुत्थभस्मीकरणम्—
अश्वत्थचिञ्चात्वग्भस्म नागस्य चतुरंशतः ।
क्षिपेन्नागं पचेत्पात्रे चालयेल्लोहचाडुना ॥ १८० ॥
यावद्भस्म तदुद्धृत्य भस्मतुल्यां मनःशिला ।
जम्बोरैरारनालैर्वा पिष्ट्वा रुद्ध्वा पुटे पचेत् ॥ १८१ ॥
स्वाङ्गशीतं पुनः पिष्ट्वा विंशत्यंशशिलायुतम् ।
अम्लेनैव तु यामैकं पूर्ववत्पाचयेत्पुटे ॥
एवं षष्टिपुटैः पक्को नागः स्यात्सुनिरुत्थकः ॥ १८२ ॥
शुद्ध नाग को कड़ाही में द्रवित कर के उसमें नाग से चतुर्थांश पीपल और इमली की त्वचा की राख डालकर लौह दण्ड से एक प्रहर तक खूब घोटना