रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
Page 267 of 362
Read in context- पञ्चमोऽध्यायः । १७७
कण्डयेद्दृढनिर्घातैः स्थूलया लोहपारया ।
तन्मध्यात्स्थूलखण्डानि रुद्ध्वा मल्लद्वयान्तरे ॥ १११ ॥
ध्मात्वा क्षिप्त्वा जले सम्यक् पूर्ववत्कण्डयेत्खलु ।
तच्चूर्णं सूतगन्धाभ्यां पुटेद्विंशतिवारकम् ॥ ११२ ॥
पुटे पुटे विधातव्यं पेषणं दृढवत्तरम् ।
एवं भस्मीकृतं लौहं तत्तद्रोगेषु योजयेत् ॥ ११३ ॥
तीक्ष्ण लौह के ( जो कि दलरहित हों ) छोटे २ पत्रों को तीव्र अग्नि में अत्यन्त प्रतप्त कर पत्थरी की ओखली में भरे हुए जल में बुझावे, फिर उस जल में से तुरन्त निकालकर लौह की ओखली ( उलूखल या इमामदस्ता ) में डाल-कर स्थूल लौह के दण्ड ( बत्थे ) से चूर्ण करे। फिर उस चूर्ण में से बड़े २ लौह के पत्रों को सम्पुट में बन्दकर के अत्यन्त लाल कर जल में बुझा लेवे, फिर पूर्ववत् चूर्ण करले इस प्रकार उस लौहचूर्ण में समान भाग पारद और गन्धक की कजली मिलाकर सम्पुट में बन्दकर फूके इस तरह प्रत्येक पुट में समान नवीन कज्जली मिलाकर खूब खरल में घोटकर बीसवार पुट देना चाहिए। इस तरह भस्म किये हुए लौह का सर्व रोगों में प्रयोग करना चाहिए ॥ ११०-११३ ॥
अथ कान्तलौहस्य गुणाः—
कान्तायः कमनीयकान्तिजननं पाण्ड्वामयोन्मूलनम् ।
यक्ष्मव्याधिनिबर्हणं गरहरं दोषत्रयोन्मूलनम् ॥
नानाकुष्ठनिबर्हणं बलकरं वृष्यं वयस्तम्भनम् ।
सर्वव्याधिहरं रसायनवरं भौमामृतं नापरम् ॥ ११४ ॥
कान्त लौह शरीर की सुन्दर आकृति को उत्पन्न करता है और पाण्डु, राज-यक्ष्मा, विषबाधा, त्रिदोषविकार तथा सर्व प्रकार के कुष्ठ को नष्ट करता है, बल को बढ़ाता है, वृष्य और वयः स्थापक है ओर यह सम्पूर्ण रोगों को नष्ट करता है, अत्यन्त श्रेष्ठ रसायन है, इससे बढकर पृथ्वी पर कोई अन्य अमृत नहीं है ॥ ११४ ॥
लौहस्य मारणान्तरम्—
हिङ्गुलस्य पलान्पञ्च नारीस्तन्येन पेषयेत् ।
तेन लोहस्य पत्राणि लेपयेत्पलपञ्चकम् ॥ ११५ ॥
रस० १२