रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextपञ्चमोऽध्यायः । १६७
कज्जलीं ताम्रपत्राणि पर्यायेण विनिक्षिपेत् ।
प्रपंचेद्यामपर्यन्तं स्वाङ्गशीतं विचूर्णयेत् ॥ ६० ॥
पारद से द्विगुण ताम्रपत्र लेकर दोनों को घृतकुमारी के रस से घोटकर एक हण्डिका में ताम्र के वरावर गन्धक डालकर उस गन्धक के बीच में ताम्र पत्र रख दें पश्चात् एक सकोरे से उस ताम्र को कपड़ मिट्टी द्वारा बन्दकर हण्डी के शेष भाग को नमक से भरकर हण्डिका का मुख दूसरे सकोरे से कपड़ मिट्टी द्वारा बन्द कर दें पश्चात् चूल्हे पर चार प्रहर तक पकाके निकाल कर ताम्र का चूर्ण कर लें । इस चूर्ण को पिप्पली और शहद के साथ एक रत्ती की मात्रा से सब रोगों के लिये प्रयोग करें ॥ ५८-६० ॥
ताम्रभस्मगुणाः—
तत्तद्रोगहरानुपानसहितं ताम्रं द्विवल्लोन्मितं
संलीढं परिणामशूलमुदरं शूलं च पाण्डुज्वरम् ।
गुल्मप्लीहयकृत्क्षयाग्निसदनं मेहं च मूलामयं
दुष्टां च ग्रहणीं हरेद् ध्रुवमिदं श्रीसोमनाथाभिधम् ॥ ६१ ॥
इति ताम्राधिकारः ।
**ताम्रभस्म के गुण—**यह भस्म श्वास, कास, क्षय, पाण्डु, मन्दाग्नि, अग्निमांद्य, अरुचि, गुल्म, प्लीह, यकृत्, मूर्च्छा, शूल, परिणामशूल सप्तधातुगत ज्वर और वातादिदोषत्रय प्रकोप से उत्पन्न समस्त रोगों को अनुकूल अनुपान के साथ सेवन करने से नष्ट करती है तथा रस और रसायन कार्य के लिये भी उचित मात्रा से ताम्र का प्रयोग करना चाहिये ॥ ६१ ॥
ग्रन्थान्तरोक्तताम्रप्रयोगः—
सूताद् द्विगुणितं ताम्रपत्रं कन्यारसैः प्लुतम् ।
पिष्ट्वा तुल्येन बलिना भाण्डमध्ये विनिक्षिपेत् ॥ ६२ ॥
छन्नं शरावकेणैतत्तदूर्ध्वं लवणं त्यजेत् ।
मुखे शरावकं दत्त्वा वह्निं यामचतुष्टयम् ॥ ६३ ॥
अवचूर्ण्यैव तच्छुल्वं वल्लमात्रं प्रयोजयेत् ।
पिप्पलीमधुना सार्धं सर्वरोगेषु योजयेत् ॥ ६४ ॥
श्वासं कासं क्षयं पाण्डुमग्निमांद्यमरोचकम् ।