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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

DevanagariHindipublished362 pages

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पञ्चमोऽध्यायः।
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और वीर्य्य का हरण होता है, शरीर में अनेक रोग उत्पन्न होते हैं तथा बैचेनी और मरण करता है ॥ २० ॥

अथ रजतम्—रजतभेदाः—
सहजं खनिजञ्जातं कृत्रिमं त्रिविधं मतम् ।
रजतं पूर्वपूर्वं हि स्वगुणैरुत्तरोत्तरम् ॥ २१ ॥
चान्दी सहज, खनिज और कृत्रिम भेद करके तीन तरह की होती है । तीनों में पूर्व पूर्व की चांदी अपने २ गुणों में उत्कृष्ट होती है ॥ २१ ॥

सहजरौप्योत्पत्तिर्गुणाश्च—
कैलासाद्यद्रिसम्भूतं सहजं रजतं भवेत् ।
तत्स्पृष्टं हि सकृद्व्याधिनाशनं देहिनां भवेत् ॥ २२ ॥
कैलासादि पर्वत में उत्पन्न होने वाली चान्दी सहज होती है । इसके स्पर्श मात्र से मनुष्यों की व्याधियां तुरन्त नष्ट हो जाती हैं ॥ २२ ॥

खनिजरौप्योत्पत्ति गुणाश्च—
हिमालयाद्रिकूटेषु यद्रूप्यं जायते हि तत् ।
खनिजं कथ्यते तज्ज्ञैः परमं हि रसायनम् ॥ २३ ॥
हिमालय आदि पर्वतों के शिखरों की खानों से उत्पन्न चान्दी को विद्वान् लोग खनिज चान्दी कहते हैं और वह उत्तम रसायन है ॥ २३ ॥

कृत्रिमरौप्योत्पत्तिर्गुणाश्च—
श्रीरामपाडुकान्यस्तं वङ्गं यद्रूप्यतां गतम् ।
तत्पादरूप्यमित्युक्तं कृत्रिमं सर्वरोगनुत् ॥ २४ ॥
श्रीरामचन्द्रजी के चरणों के स्पर्श से जो वङ्ग चान्दी के रूप में परिणत हुआ उसको रामचन्द्रजी के चरण की कृत्रिम चान्दी कहते हैं। यह सर्वरोगों को नष्ट करती है॥२४॥

उत्तमरौप्यलक्षणम्—
घनं स्वच्छं गुरु स्निग्धं दोहे छेदे सितं मृदु ।
शङ्खाभं मसृणं स्फोटरहितं रजतं शुभम् ॥ २५ ॥
श्रेष्ठ रजत के लक्षण—जो चान्दी वजनदार, खच्छ, भारी, स्निग्ध जलाने और काटने पर श्वेत, कोमल, मसृण, शङ्ख के समान और खातों से रहित हो वह औषधि में श्रेष्ठ है ॥ २५ ॥