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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

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Page 231

• चतुर्थोऽध्यायः। १४१

जो हीरा लम्बा, गोल और चपटा हो वह स्त्री जाति का है। जो हीरा गोल मुड़े कोण वाला और भारी हो वह नपुंसक जाति का होता है ॥ २९ ॥

जातिभेदेनाधिकारीभेदकथनम्—
स्त्रीपुन्नपुंसकं वज्रं योज्यं स्त्रीपुन्नपुंसके ।
व्यत्यासान्नैव फलदं पुंवज्रेण विना क्वचित् ॥ ३० ॥

जो पुरुष जाति का हीरा हो उसका पुरुष के औषधि के लिये प्रयोग करें और स्त्री जाति का हीरा स्त्री जाति के लिये और नपुंसक जाति के हीरे को नपुंसक जाति के मनुष्य के लिए औषधार्थ प्रयोग करना चाहिये । पुरुष जाति हीरे को छोड़कर अन्य जाति के हीरों का प्रयोग भिन्न २ जाति में करने से लाभ नहीं होता है ॥ ३० ॥

वर्णभेदेनाधिकारीभेदकथनम्—
श्वेतादिवर्णभेदेन तदेकैकं चतुर्विधम् ।
ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रं स्वस्ववर्णफलप्रदम् ॥ ३१ ॥
उत्तमोत्तमवर्णं हि नीचवर्णफलप्रदम् ।
न्यायोऽयं भैरवेणोक्तो पदार्थेष्वखिलेष्वपि ॥ ३२ ॥

प्रत्येक जाति का हीरा श्वेत, पीत, लाल, काला इन वर्ण भेदों से चार प्रकार का होता है और ये चारों वर्ण के हीरे क्रम से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इन चार जातियों के कहलाते हैं । इनका उपयोग भी अपनी २ जाति में करना चाहिए । उत्तम वर्ण का हीरा नीच वर्ण के पुरुषों में प्रयोग करने से भी फलप्रद होता है किन्तु नीच वर्ण के हीरे को उत्तमवर्ण के पुरुषों में प्रयोग करने से निष्फल होता है । यह न्याय भैरव नाम के आचार्य के द्वारा सम्पूर्ण पदार्थों के विषय में बतलाया गया है ॥ ३२ ॥

अथ वज्रगुणाः—
आयुष्प्रदं झटिति सद्गुणदं च वृष्यं
दोषत्रयप्रशमनं सकलामयघ्नम् ।
सूतेन्द्रबन्धवधसद्गुणकृत्प्रदीपनं
मृत्युञ्जयं तदमृतोपममेव वज्रम् ॥ ३३ ॥

हीरे के गुणः— यह आयु को बढ़ाता है, तत्काल ही शरीर में अनेक गुणों को