रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context१३४ रसरत्नसमुच्चये—
रसबन्धनमुत्कृष्टं केशरञ्जनमुत्तमम् ॥ १५६ ॥
यह गुरु होता है, कफ के विकारों को शान्त करता है, मनुष्यों के उपदंशादि रोगों को नष्ट करता है, यह बन्धन में उत्कृष्ट है, केशों पर लगाने से उन्हें काला कर देता है ॥ १५६ ॥
साधारणशोधननिर्देशः—
साधारणरसाः सर्वे मातुलुङ्गाऽर्द्रकाम्बुना ।
त्रिरात्रं भाविताः शुष्का भवेयुर्दोषवर्जिताः ॥ १५७ ॥
उपर्युक्त सब प्रकार के साधारण रस बिजौरे निम्बू के रस और अदरक के रस से तीन दिन तक भावना देकर सुखा लेने से शुद्ध हो जाते हैं ॥ १५७ ॥
अथ सत्त्वानां सामान्यशोधनम्—
यानि कानि च सत्त्वानि तानि शुध्यन्त्यशेषतः ।
ध्मातानि शुद्धिवर्गेण मिलन्ति च परस्परम् ॥ १५८ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भट्टाचार्यस्य कृतौ रसरत्नसमुच्चये उपरससाधारणरसानां शुद्ध्यादिनिरूपणं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इसी तरह सम्पूर्ण सत्त्वों को शुद्धिवर्ग के पदार्थों के साथ घोटकर फूंकने से शुद्ध हों जाते हैं और परस्पर मिलने के योग्य हो जाते हैं ॥ १५८ ॥
इति श्रीकृष्णआत्मजेन पण्डितप्रवरेण श्रीअम्बिकादत्तशास्त्रिणा विरचितायां रसरत्नसमुच्चयस्य रत्नोज्ज्वलाख्य-भाषाटीकायामुपरससाधारणरसनिरूपणं नाम तृतीयोऽध्यायः ।