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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

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Page 221

-तृतीयोऽध्यायः। १३१

रसेन्द्रजारणे प्रोक्ता विडद्रव्येषु शस्यते ॥ १३९ ॥
तदन्ये तु वराटाः स्युर्गुरवः श्लेष्मपित्तलाः ॥ १४० ॥

भोजन पचने पर उत्पन्न शूल (परिणाम शूल) तथा ग्रहणी और क्षय को कौड़ी नष्ट करती है। यह कटु, उष्ण, दीपनी और वृष्य होती है। नेत्रों के लिये हितकर है, वात और कफ को नष्ट करती है, पारद के जारण में श्रेष्ठ है और विड् द्रव्यों में प्रशस्त है, इससे विपरीत लक्षण वाली वराट कौड़ी कहलाती है, वह वजन में भारी और वातपित्त को पैदा करती है ॥ १३९-१४० ॥

अथ शोधनम्—
वराटाः काञ्जिके स्विन्ना यामाच्छुद्धिमवाप्नुयुः ॥ १४१ ॥
इति वराटिकाधिकारः।

वराटों को काञ्जी में स्वेदन करने से शुद्ध हो जाती हैं ॥ १४१ ॥

अथाग्निजारनिरूपणम्—
अथाग्निजारपरिचयः—
समुद्रेणाग्निनक्रस्य जरायुर्बहिरुज्झितः ।
संशुष्को भानुतापेन सोऽग्निजार इति स्मृतः ॥ १४२ ॥

समुद्र ने अग्निनक्रनामक जलचर के जरायु (गर्भ कोष) को बाहर फेंक दिया, पश्चात् वह सूर्य की धूप से सूख गया उसी को अग्निजार या अम्बर कहते हैं ॥ १४२ ॥

अथ गुणाः—
अग्निजारस्त्रिदोषघ्नो धनुर्वातादिवातनुत् ।
वर्धनो रसवीर्यस्य दीपनो जारणस्तथा ॥ १४३ ॥

अग्निजार त्रिदोष को नष्ट करता है, धनुर्वात आदि वातरोगों को दूर करता है, रस वीर्य को बढ़ाता है, अग्नि दीपक और धातुओं का जारण करता है ॥ १४३ ॥

अथ तस्य स्वभावतः शुद्धत्वनिर्देशः—
यदन्धिक्षारसंशुद्धस्तस्माच्छुद्धिर्न हीष्यते ॥ १४४ ॥
इत्यग्निजाराधिकरः।

यह समुद्रक्षार के सम्पर्क में रहने से शुद्ध ही होता है अतः इसकी शुद्धि करना नहीं इष्ट है ॥ १४४ ॥