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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

Page 215 of 362

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Page 215

तृतीयोऽध्यायः। १२५

नलियों में सञ्चित करने से कङ्कुष्ठ नलिकाकार मिलता है तथा चूर्ण रूप में भी मिलता है। सम्भव है कि वजन अधिक होने हो के कारण खनिजों के साथ इसका वर्णन किया गया है। अन्य प्रकार से जो मूल में इसकी उत्पत्ति बताइ गई है इसकी सत्यता अभी तक प्रमाणित नहीं हुई है।

अथ गुणाः—
रसे रसायनं श्रेष्ठं निःसत्त्वं बहु वैकृतम् ॥ ११७ ॥
कङ्कुष्ठं तिक्तकटुकं वीर्योष्णं चातिरेचनम् ।
व्रणोदावर्त्तशूलार्त्तिगुल्मप्लीहगुदार्त्तिनुत् ॥ ११८ ॥
कङ्कुष्ठ रस और रसायन कर्म में अत्यन्त श्रेष्ठ होता है परन्तु जो सत्त्वरहित होता है वह विकार उत्पन्न करता है। कङ्कुष्ठ तिक्त, कटु और उष्णवीर्य्य होता है तथा अत्यन्त रेचक भी होता है और व्रण, उदावर्त, शूल, गुल्म, प्लीहवृद्धि, अर्श इनका नाशक है ॥ ११७-११८ ॥

रसोपरसानां सामान्यशोधनं सत्त्वपातनविधिश्च—
सूर्यावर्त्तकदली वन्ध्या कोशातकी च सुरदाली ।
शिग्रुश्च वज्रकन्दो नीरडूणाकाकमाची च ॥ ११९ ॥
आसामेकरसेन तु लवणक्षाराम्लभाविता बहुशः ।
शुद्ध्यन्ति रसोपरसा ध्माता मुञ्चन्ति सत्त्वानि ॥ १२० ॥
सम्पूर्ण रस तथा उपरसौं का शोधन और सत्त्वपातन सुवर्चला, केला, वन्ध्याककोड़ा, कोशातकी (घोषालतां), वन्दाल ( पीतघोषा ), जङ्गलीसूरणकन्द, सहजन, बालक या जलपीपल, मकोय इनमें से किसी एक के रस में और क्षार, लवण तथा अम्ल से भावना देकर रस तथा उपरसौं को शुद्ध करते हैं और इन्हीं की भावना देकर फूंकने से इनका सत्त्वपातन होता है ॥ ११९-१२० ॥

कङ्कुष्ठशोधनम्—
कङ्कुष्ठं शुद्धिमायाति त्रिधा शुण्ठ्यम्बुभावितम् ॥ १२१ ॥
सत्त्वाकर्षोऽस्य न प्रोक्तो यस्मात्सत्त्वमयं हि तत् ॥ १२२ ॥
कङ्कुष्ठ को तीन वार सोंठ के क्वाथ से भवति कर देनेसे शुद्ध होजाता है। यह स्वयं सत्त्वस्वरूप होने से इसकी सत्त्वपातनविधि नहीं कही है ॥ १२१-१२२ ॥

रेचकयोगः—
भजेदेनं विरेकार्थे ग्राहिभिर्यवमात्रया ।