रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
Page 206 of 362
Read in context११६ रसरत्नसमुच्चये—
स्निग्धमुष्णकटुकञ्च दीपनं कुष्ठहारि हरितालमुच्यते ॥ ७३ ॥
हरताल दूषित कफ, रक्तविकार, विष, भूतवाधा (कृमियों का आक्रमण) और वायु के विकारों को दूर करती है। स्त्रियों के मासिकधर्म को नष्ट करती है और स्निग्ध, उष्ण, कड़वी तथा अग्निदीपक और कुष्ठ को नष्ट करती है ॥ ७३ ॥
अथ हरतालशुद्धिः—
स्विन्नं कूष्माण्डतोये वा तिलक्षारजलेऽपि वा ।
तोये वा चूर्णसंयुक्ते दोलायन्त्रेण शुद्ध्यति ॥ ७४ ॥
हरताल को दोलायन्त्रद्वारा कुष्माण्डस्वरस, तिलक्षारोदक या चूने के जल में स्वेदन करने से शुद्ध हो जाती है ॥ ७४ ॥
अशुद्धतालसेवनदोषाः—
अशुद्धं तालमायुर्घ्नं कफमारुतमेहकृत् ।
तापस्फोटाङ्गसङ्कोचं कुरुते तेन शोधयेत् ॥ ७५ ॥
अशुद्ध हरताल आयु को नष्ट करती है, कफ तथा वायु के रोग और प्रमेह उत्पन्न करती है। शरीर में जलन, सङ्कोच और फोड़ा फुन्सी उत्पन्न करती है, इस कारण इसका शोधन करना चाहिये ॥ ७५ ॥
मतान्तरेण तालशोधनम् ।
तालकं कणशः कृत्वा दशांशेन च टङ्कणम् ।
जम्बीरोत्थद्रवैः क्षाल्यं काञ्जिकैः क्षालयेत्ततः ॥ ७६ ॥
वस्त्रे चतुर्गुणे बद्ध्वा दोलायन्त्रे दिनं पचेत् ।
सचूर्णेनारनालेन दिनं कूष्माण्डजे रसे ।
स्वेद्यं वा शाल्मलीतोयैस्तालकं शुद्धिमाप्नुयात् ॥ ७७ ॥
हरताल के टुकड़े २ कर के उसमें दशमांश सुहागा मिलाकर निम्बूरस से सात वार और काञ्जी से भी सातवार घोट के धोकर चारपर्त किए वस्त्र में बांध कर दोलायन्त्र द्वारा एक दिन तक चूनामली हुई काञ्जी में स्वेदन करें अथवा कुष्माण्ड जल में या शाल्मली रस में स्वेदन करें इस तरह ताल शुद्ध हो जाती है ॥ ७६–७७ ॥
अथ मतान्तरेण शोधनमारणनिरूपणम्—
मधुतुल्ये घनीभूते कषाये ब्रह्ममूलजे ।
त्रिवारं तालकं भाव्यं पिष्ट्वा मूत्रेऽथ माहिषे ॥ ७८ ॥