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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

Page 177 of 362

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Page 177

द्वितीयोऽध्यायः । ८७

तत्र शूलं समुत्पन्नं तत्रैव विलयं गतम् ॥ १३२ ॥
मन्त्रेणानेन मुद्राम्भो निपीतं सप्तमन्त्रितम् ।
सद्यःशूलहरं प्रोक्तमिति भालुकिभाषितम् ॥ १३३ ॥
अनया मुद्रया तप्तं तैलमग्नौ सुनिश्चितम् ।
लेपितं हन्ति वेगेन शूलं यत्र क्वचिद्भवेत् ॥
सद्यः सूतिकरं नार्याः सद्यो नेत्ररुजापहम् ॥ १३४ ॥
इति सस्यकाधिकारः ।

राम शब्द से लेकर गतम् यहां तक मन्त्र का स्वरूप है। इस मन्त्र को पढ़ते हुए मुद्रा को जल में छोड़ दे' । इस तरह सात वार मन्त्र से जल को अभिमन्त्रित कर के पीलाने से शीघ्र ही शूल नष्ट होजाता है । यह भालुकि महर्षि का कथन है । इस अंगूठी को तैल में डाल कर अग्नि पर पकावें । फिर जहां कहीं शूल चलता हो वहां इस तैल के लगाने से शूल चलना वन्द हो जाता है तथा गर्भवती स्त्रियों के हस्त पाद पर लगा के मर्दन करने से तुरन्त प्रसव होता है । नेत्रों में लगाने से नेत्र पीड़ा दूर हो जाती है ॥१३२-१३४॥

अथ चपलः—
गौरः श्वेतोऽरुणः कृष्णश्चपलस्तु चतुर्विधः ।
हेमाभश्चैव ताराभो विशेषाद्रसबन्धनः ॥ १३५ ॥
शेषौ तु मध्यौ लाक्षावच्छीघ्रद्रावौ तु निष्फलौ ।
वङ्गवद्द्रवते वह्नौ चपलस्तेन कीर्तितः ॥ १३६ ॥

चपल धातु सर्षप वर्ण युक्त ( गौर ) और श्वेत, रक्त तथा कृष्ण इस तरह चार प्रकार का होता है। गौर और श्वेत चपल पारद के बन्धन करने में श्रेष्ठ हैं । शेष रक्त तथा कृष्ण वर्ण की चपल लाह के समान शीघ्र द्रव हो जाने के कारण मध्यम कही गई है तथा उन से विशेष फल भी नहीं होता है । यह धातु अग्नि में वङ्ग ( रांगा ) के समान द्रव हो जाता है । इस कारण इसको चपल कहते हैं ॥ १३५-१३६ ॥

**विमर्श:—**चपल को बिस्मथ ( Bismuth ) कहते हैं । इसका संकेत Bi है तथा परमाणु भार ( Atomic weights ) २०९ है ।
**उपस्थिति—**यह धातु मुक्तावस्था में भी पाई जाती है । इस धातु की प्राप्ति