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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

Page 175 of 362

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Page 175

द्वितीयोऽध्यायः ।
८५

अथ गुणाः—
निःशेषदोषविषहृद्गदशूलमूलकुष्ठाम्लपैत्तिकविबन्धहरं परञ्च ॥
रसायनं वमनरेककरं गरघ्नं श्वित्रापहं गदितमत्र मयूरतुत्थम् ॥१२२॥
नील तुत्थ कुपित वात पित्तादि सम्पूर्ण दोष, विषप्रभाव, हृदय रोग, शूल, अर्श, कुष्ठ, अम्लपित्त तथा विबन्ध (मलावरोध) को नष्ट करता है। यह अत्यन्त श्रेष्ठ रसायन है। इस से वमन तथा विरेचन कर्म होते हैं और श्वेत कुष्ठ तथा विष के आक्रमण को दूर करता है ॥ १२२ ॥

अथ शोधनम्—
सस्यकं शुद्धिमाप्नोति रक्तवर्गेण भावितम् ॥ १२३ ॥
नीलतुत्थ रक्त वर्ग में कही हुई जपाकुसुमादि औषधियों के रस की भावना से शुद्ध होता है ॥ १२३ ॥

अथ मतान्तरम्—
स्नेहवर्गेण संसिक्तं सप्तवारमदूषितम् ॥
दोलायन्त्रेण सुस्विन्नं सस्यकं प्रहरत्रयम् ।
गोमहिष्याजमूत्रेषु शुद्धयते तुत्थखर्परम् ॥ १२४ ॥
अथवा नील तुत्थ को तप्त कर स्नेह वर्गोक्त घृत, तैल, वसा आदि पदार्थों में सात बार बुझा कर शुद्ध करते हैं। केवल दोलायन्त्र में ३ प्रहर तक गौ, भैंस और बक़री के मूत्र के साथ स्वेदन करने से भी नीलतुत्थ शुद्ध हो जाता है ॥ १२४ ॥

अथ तुत्थखर्परमारणम्—
लकुचद्रावगन्धाश्मटङ्कणेन समन्वितम् ।
निरुध्य मूषिकामध्ये म्रियते कौक्कुटैः पुटैः ॥ १२५ ॥
शुद्ध नीलतुत्थ को समान गन्धक और टङ्कण के साथ बड़हल के फल के स्वरस में घोट कर मूषायन्त्र में बन्ध कर के कुक्कुट पुट देने से भस्म हो जाती है॥१२५॥

अथ तुत्थसत्त्वपातनम्—
सस्यकस्य तु चूर्णं तु पादसौभाग्यसंयुतम् ।
करञ्जतैलमध्यस्थं दिनमेकं निधापयेत् ॥ १२६ ॥
अन्धमूषास्यमध्यस्थं ध्मापयेत्कोकिलत्रयम् ।
इन्द्रगोपाकृति चैव सत्त्वं भवति शोभनम् ॥ १२७ ॥