Skip to content
SarvaKosh
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished362 pages

Page 162 of 362

Read in context
Page 162

७२
रसरत्नसमुच्चये—

नया मूत्र डाल २ कर बुझाना चाहिए । बाद में पुट देने पर वज्र के स्थान पर प्रयोग करने लायक भस्म हो जाती है ॥ ६५ ॥

अथ सत्त्वपातनम्—

मोचमोरटपालाशक्षारगोमूत्रभावितम् ।
वज्रकन्द निशाकल्क फलचूर्णसमन्वितम् ॥ ६६ ॥
तत्कल्कं टङ्कणं लाक्षाचूर्णं वैक्रान्तसम्भवम् ।
नरसारसमायुक्तं मेषशृङ्गीद्रवान्वितम् ॥ ६७ ॥
पिण्डितं मूकमूषस्थं ध्मापितं च हठाग्निना ।
तत्रैव पतते सत्त्वं वैक्रान्तस्य न संशयः ॥ ६८ ॥

कदली कन्द (केले की जड़) मोरट (इक्षुमूल) रस पलाश (ढाक) का क्षार और गोमूत्र इनसे वैक्रान्त को भावित करे। पश्चात् उसमें जङ्गली सूरण कन्द तथा हल्दी का कल्क और त्रिफला का चूर्ण, सोहागा, लाह चूर्ण और नोसादर मिलाकर मेंढासिङ्गी के स्वरस से घोट कर गोला बनावे । उस गोले को अन्धमूषा में रख कर धौंकनी (भस्त्रा) से अग्नि को दीप्त करके फूंके । इससे निश्चय ही सत्व निकल आता है ॥ ६६-६८ ॥

अथ मतान्तरम्—

सत्त्वपातनयोगेन मर्दितश्च वटीकृतः ।
मूषास्थो घटिकाध्मातो वैक्रान्तः सत्त्वमुत्सृजेत् ॥ ६९ ॥

सत्त्व निकालने में प्रयुक्त होने वाली औषधियों के साथ वैक्रान्त को घोट कर गोला बनाकर मूषायन्त्र में रख कर एक घण्टे तक तीव्र अग्नि से धमन करने से सत्त्व निकल जाता है ॥ ६९ ॥

अथ मृतवैक्रान्तस्य प्रयोगविधिर्गुणाश्च—

भस्मत्वं समुपागतो विक्रान्तको हेम्ना मृतेनान्वितः
पादांशेन कणाज्यवेल्लसहितो गुञ्जामितः सेवितः ।
यक्ष्माणं जरणं च पाण्डुगुदजं श्वासं च कासामयं
दुष्टां च ग्रहणीमुरःक्षतमुखान् रोगान्क्षयेद्देहकृत् ॥ ७० ॥

भस्म हुए एक रत्ती वैक्रान्त में चतुर्थभाग रूप में सुवर्ण भस्म मिलाकर विडङ्ग, छोटी पीपल और घृत मिला कर सेवन करने से राजयक्ष्मा, बुढापा,