Skip to content
SarvaKosh
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished362 pages

Page 160 of 362

Read in context
Page 160

७० | रसरत्नसमुच्चये—

**उपलब्धि—**यह खनिज प्रथम सीलोन से निकलता था किन्तु आजकल विशेष कर अफ्रीका से निकलता है तथा वहीं से सर्वत्र वितरित होता है। इसके जो अनेक वर्ण के सुन्दर २ कण (क्रिस्टल्स् Crystals) आते हैं उनकी गणना रत्नों में होती है। इसी लिये इस ग्रन्थ में इसका आगे रत्नों के साथ भी उल्लेख किया गया है। इसके बहुमूल्य कणों को जौहरी अनेक प्रकार के आभूषणों में काम में लाते हैं।

इसके कृष्णवर्ण के खनिज में लोहे का अंश अधिक होता है इस लिये उसका ही विशेष कर के औषध कर्म में प्रयोग करना चाहिए।

वैक्रान्तस्य स्थानं निरुक्तिञ्चाह—

विन्ध्यस्य दक्षिणे भागे ह्युत्तरे वाऽस्ति सर्वतः।
विक्रन्तयति लोहानि तेन वैक्रान्तकः स्मृतः ॥ ५८ ॥

यह वैक्रान्त विन्ध्याचल पर्वत के उत्तर तथा दक्षिण भाग में सर्वत्र खानों में प्राप्त होता है तथा लौह ताम्रादिक समग्र धातुओं को काट डालने से वैक्रान्त कहा जाता है॥ ५८ ॥

मतान्तरेण वर्णभेदकथनम्—

श्वेतः पीतस्तथा रक्तो नीलः पारावतप्रभः।
मयूरकण्ठसदृशश्चान्यो मरकतप्रभः ॥ ५९ ॥

यह श्वेत, पीत, रक्त, नील और कबूतर के समान धूम्रवर्ण वाला तथा मयूर के कण्ठ के समान चित्रवर्ण युक्त और मरकतमणि के तुल्य वर्ण वाला सात रङ्ग का होता है॥ ५९ ॥

वर्णभेदेन कार्यभेदकथनम्—

देहसिद्धिकरं कृष्णं पीते पीतं सिते सितम्।
सर्वार्थसिद्धिदं रक्तं तथा मरकतप्रभम्॥
शेषे द्वे निष्फले वर्ज्ये वैक्रान्तमिति सप्तधा ॥ ६० ॥

कृष्णवर्ण वाला वैक्रान्त शरीर को सिद्धि प्रदान (अजरअमर) करता है। पीत वैक्रान्त को स्वर्ण के जारण मारण में प्रयोग करते हैं। इसी तरह श्वेत को चांदी के लिये या श्वेत कुष्ठादिरोगों में प्रयुक्त करते हैं। लाल तथा मरकत मणि समान वर्ण वाले वैक्रान्त को सेवन करने से सम्पूर्ण सिद्धियां प्राप्त होती हैं। शेष दो रंगवाला (नील तथा कबूतर वर्ण) वैक्रान्त विशेष फल नहीं करने से वर्जनीय है। इस तरह वैक्रान्त सात प्रकार का होता है॥ ६० ॥