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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

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६८ | रसरत्नसमुच्चये—

कर चूर्ण करलें, फिर उस चूर्ण को पूर्वोक्त विधि से गोघृत से भूँजना चाहिए । अथवा इसी तरह आंवले के फल या पत्नों के स्वरस से भूनना चाहिए । प्रत्येक भर्जन के समय शिलापट्ट से चूर्ण करना आवश्यक है । बाद में पुनर्नवा और वासा के स्वरस में काञ्जी मिला कर घोट कर दश वार पुट देना चाहिए । इसी तरह गन्धक के साथ भी घोट कर दस पुट देना चाहिए । इस तरह शोधित किया हुआ अभ्रक सत्व सर्वगुण युक्त होता है और उस का पारद के जारण या रसायन में यथेष्ट प्रयोग कर सकते हैं। द्रुतियों का शास्त्र में वर्णन होने पर भी उपयोग ठीक विधि से नहीं बताया गया है और ये शिवजी की अनुकम्पा के बिना सिद्ध भी नहीं होती हैं ॥ ४५–५० ॥

अथाभ्रप्रयोगः—

वेल्लव्योषसमन्वितं घृतयुतं वल्लोन्मितं सेवितं
दिव्याभ्रं क्षयपाण्डुरुग्ग्रह णिकाशूलामकुष्ठामयम् ।
जूर्ति श्वासगदं प्रमेहमरुचिं कासामयं दुर्धरं
मन्दाग्निं जठरव्यथां विजयते योगैरशेषामयान् ॥ ५१ ॥

इत्यभ्रकाधिकारः ।

वायविडङ्ग, सोंठ, मिर्च, पिप्पल, प्रत्येक का दो दो रत्ती चूर्ण करले फिर उस चूर्ण में घृत मिलाकर दो रत्ती अभ्रक रस मिलाकर सेवन करे । इससे क्षय, पाण्डु, ग्रहणी, खांसी, शूल, आंव, और कुष्ठ रोग, ज्वर, श्वास, बीस प्रकार के प्रमेह, अरुचि, असाध्य कास रोग, मन्दाग्नि, उदर की समस्त व्याधियां और भिन्न २ अनुपानों से समग्र व्याधियां नष्ट हो जाती है ॥ ५१ ॥

अथ वैक्रान्तः—

अष्टास्रश्चाष्टफलकः षट्कोणो मसृणो गुरुः ।
शुद्धमिश्रितवर्णैश्च युक्तो वैक्रान्त उच्यते ॥ ५२ ॥

आठ कोनों तथा आठ फलकों से युक्त और षट्कोणवाला, स्निग्ध, भारी, शुद्ध और मिश्रित रङ्ग वाला उत्तम वैक्रान्त होता है ॥ ५२ ॥

अथ वैक्रान्तस्य वर्णभेदाः—

श्वेतो रक्तश्च पीतश्च नीलः पारावतच्छविः ।
श्यामलः कृष्णवर्णश्च कर्बुरश्चाष्टधा हि सः ॥ ५३ ॥