Skip to content
SarvaKosh
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished362 pages

Page 155 of 362

Read in context
Page 155

द्वितीयोऽध्यायः । [६५]

जाने पर बकरी का दुग्ध, दही, घृत, मूत्र और मिंगनी (मल) ये पांच वस्तु मिलाकर या पञ्चगव्य अथवा भैंस की दुग्धादि पांच वस्तु मिलाकर एक कर्ष से अधिक मोटे गोले बनाकर अधःपातन कोष्ठिका यन्त्र में रख कर फूंकने से अभ्रक का सत्व निकल जाता है । दुग्ध, दही, घी, मूत्र और गोबर इनका मिश्रण पञ्चगव्य है ॥ २७–३१ ॥

अथ किट्टात्सत्वग्रहणम्—

कोष्ठ्यां किट्टं समाहृत्य विचूर्ण्य रवकान्हरेत् ।
तत्किट्टं स्वल्पटङ्केन गोमयेन विमर्द्य च ॥ ३२ ॥
गोलान्विधाय संशोष्य घर्मे भूयोऽपि पूर्ववत् ।
भूयः किट्टं समाहृत्य मृदित्वा सत्त्वमाहरेत् ॥ ३३ ॥

पश्चात् मूषा में से शेष अभ्रक के किट्ट को निकाल कर चूर्ण कर के उस में आठवां भाग टङ्कण और समभाग गौ का गोबर मिलाकर मर्दन करे और फिर घाम में शुष्क कर पूर्वानुसार सत्व निकाल ले, फिर भी किट्ट शेष रहे तो इसी रीति से टङ्कण और गोबर मिलाकर सत्व निकालना चाहिए ॥ ३२–३३ ॥

अथ सत्वशोधनम्—

अथ सत्त्वकणांस्तांस्तु काथयित्वाऽम्लकाञ्जिकैः ।
शोधनीयगणोपेतं मूषामध्ये निरुध्य च ॥ ३४ ॥
सम्यग्द्रुतं समाहृत्य द्विवारं प्रधमेद्द्धनम् ।
इति शुद्धं भवेत्सत्त्वं योज्यं रसरसायने ॥ ३५ ॥

बाद में अभ्रक के सत्व के कणों का खट्टी काञ्जी से क्वाथ करके फिर शोधन गण की वस्तुओं के रस में घोट कर गोले बना कर मूषा यन्त्र में बन्द कर के फूंके । इस तरह द्रुत हुए सत्व को द्वितीय वार शोधन गण की औषधियों से घोट कर गोले बनाले पश्चात् उन्हें मूषा यन्त्र में बन्द करके फूंकने से वह सत्व शुद्ध हो जाता है और रस तथा रसायन के काम में आता है ॥ ३४–३५ ॥

अथ सत्त्वानां मृदुकरणम्—

मधुतैलवसाज्येषु द्रावितं परिवापितम् ।
मृदु स्याद्दशवारेण सत्त्वं लोहादिकं खरम् ॥ ३६ ॥

अभ्रक सत्व को अग्नि संयोग से द्रवित कर के शहद, तैल, वसा और घृत में


रस० ५