रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextद्वितीयोऽध्यायः । ६३
चोलाई के रस में भी घोट कर सात पुट दें। इस तरह भस्म रूप में सिद्ध हुआ अभ्रक सब कामों में गुणकर होता हैं ॥ १६-२० ॥
अथ धान्याभ्रकम्—
चूर्णाभ्रं शालिसंयुक्तं वस्त्रबद्धं हि काञ्जिके ।
निर्यातं मर्दनाद्वस्त्राद्धान्याभ्रमिति कथ्यते ॥ २१ ॥
शुद्ध अभ्रक का चूर्ण चतुर्थांश शाली ( धान ) में मिलाकर वस्त्र में बांधके पोटली बना लें। फिर उस पोटली को काञ्जी में डालकर मर्दन करने पर वस्त्र से निकला हुआ अभ्रक धान्याभ्रक कहलाता है ॥ २१ ॥
अथ धान्याभ्रमारणम्—
धान्याभ्रं कासमर्दस्य रसेन परिमर्दितम् ।
पुटितं दशवारेण म्रियते नात्र संशयः ॥
तद्वन्मुस्तारसेनापि तन्दुलीयरसेन च ॥ २२ ॥
धान्याभ्रक को कासमर्द ( कसोञ्जी ) के रस से घोट कर दश पुट देने से मृत ( भस्म रूप ) हो जाता है। इसी तरह मुस्ते के रस में घोट कर दस पुट देना चाहिए, तथा चोलाई के रस में घोट कर दस पुट देने से मृत हो जाता है ॥२२॥
अथाभ्रमारणम्—
पीतामलकसौभाग्यपिष्टं चक्रीकृताम्रकम् ।
पुटितं षष्ठीवाराणि सिन्दूराभं प्रजायते ॥
क्षयाद्यखिलरोगघ्नं भवेद्रोगानुपानतः ॥ २३ ॥
अभ्रक में सोलवां भाग की मात्रा में सोहागा मिला कर हल्दी तथा आंवले के रस में घोट कर चक्रिका बनाकर ६२ वार पुट देने से सिन्दूर के समान रक्त वर्ण वाली भस्म हो जाती है। यह भस्म क्षय वगैरे सब रोगों को यथानुपान में देने से नष्ट करती है ॥ २३ ॥
मतान्तर—
वटमूलत्वचः क्वाथैस्ताम्बूलीपत्रसारतः ।
वासामत्स्याक्षिकाभ्यां वा मीनाक्ष्या सकठिल्लया ॥ २४ ॥
पयसा वटवृक्षस्य मर्दितं पुटितं घनम् ।
भवेद्विंशतिवारेण सिन्दूरसदृशप्रभम् ॥ २५ ॥