रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextद्वितीयोऽध्यायः। ५९
**विमर्शः—**अभ्रक को लैटिन में मायका (Mica) तथा अंग्रेजी में टाल्क (Talk) और ग्लिमर ( Glimmer ) कहते हैं। यह भी खानों से निकलता है। उपलब्धि-यह विहार प्रान्त में हजारीबाग और गिरडो तथा बङ्गाल में रानीगञ्ज के आसपास की कोयले की खानों के अन्दर मिलता है। तथा मद्रास के निलोर जिले में भी कहीं २ मिलता है और सिन्ध, तथा बम्बई प्रेसीडेन्सी के धारवाड़ जिले में भी प्राप्त होता है। पञ्जाब में कांगड़ा जिले के नूरपुर तहसील की खानों में से भस्म करने योग्य अच्छा कृष्णाभ्रक मिलता है। राजपूताना में किशनगढ तथा अजमेर के नजदीक वाले पहाड़ों में भी इसकी कहीं कहीं खाने हैं। यू० पी० में अल्मोड़ा तथा बाघेश्वर में भी कहीं २ मिलता है। अभ्रक के पिनाक, नाग, मण्डूक और वज्राभ्रक इन चार भेदों में वज्राभ्रक को लोहाभ्रक का अपर पर्याय समझना चाहिए क्यों कि वज्राभ्रक के इन
सुप्रशस्तं कठोराङ्गं गुरु कज्जलसन्निभम्।
यन्न शब्दायते वह्नौ नैवोच्छूनं भवेदपि ॥
सदाकरसमुद्भूतं वज्रेति प्रथितं घनम् ॥ ( इति र० सा० सं० )
तथा—यदञ्जननिभं क्षिप्तं न वह्नौ विकृतिं व्रजेत् ।
वज्रसंज्ञं हि तद् योज्यमभ्रं सर्वत्र नेतरत् ॥ ( इति र० चि०
लक्षणों से स्पष्ट प्रतीत होता है कि जो अभ्रक कठोर (अधिक वजनी) तथा कज्जल या काले अञ्जन के समान वर्ण का हो वह वज्राभ्रक औषध में प्रशस्त माना गया है तथा आजकल यह निश्चित हो गया है कि जिस अभ्रक में लोह का अंश अधिक होता है वही अधिक वजनी तथा काले वर्ण का होता है। इस प्रकार के अभ्रक को बायो टाईट ( Bio Tite ) कहते हैं। और भी अभ्रक की अनेक जातियां मिलती हैं किन्तु रसग्रन्थों में औषध के लिये वज्राभ्रक (लोहाभ्रक) से बढकर उनकी मह- त्वता नहीं है इस लिये यहाँ पर वर्णन नहीं किया गया है।
उत्पत्ति—“देव्या रजो भवेद्गन्धो धातुः शुक्रं तथाऽभ्रकम्”
अर्थात् ब्रह्माजी का शुक्र अथवा पार्वती देवी का धातुस्वरूप जो शुक्र है वही अभ्रक है। इससे यह दिखाया गया कि अभ्रक की उत्पत्ति का सम्बन्ध पार्वती देवी से है। इस आशय का पार्वती अर्थात् पर्वते भवा या पर्वतस्य इयं पार्वती (पर्वत सम्बन्धिनी पृथिवी या पर्वतसन्निकट पृथिवी अर्थात् पर्वत (पहाड़) की खान का धातु अर्थात् परम तत्त्व (रासायनिक परिवर्तनादिक विधियों से बना हुआ) ही अभ्रक है। इस प्रकार के अर्थ की सत्यता में प्रथम कारण तो “सदाकरसमुद्भूतं वज्रेति प्रथितं घनम्, यह तथा राजहस्तादधस्ताद्यत् समानीतं घने खनेः” आदि अपने दूर- दर्शी, त्रिकाल विज्ञानी रसशास्त्र के आचार्य की सूत्रबद्धकृति ही प्रमाण है। तथा दूसरा कारण आधुनिक युग के वैज्ञानिकों की प्रत्यक्ष करके दिखाई हुई विज्ञान चर्चा को समझना चाहिए।