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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

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प्रथमोऽध्यायः । ५५

माने गये हैं परन्तु उनका कोई विशेष उपयोग ऐसा नहीं प्रतीत होता है कि जिनका आधिक्य से विचार किया जाना आवश्यक हो । भूमिज, गिरिज, वारिज जो दोष माने हैं वे सरलता से समझ में आ सकते हैं । जिस भूमि से पारद निकला उसके संसर्गज दोष, जिस स्रोत के जल में घुल कर ऊपर आकर हिङ्गुल के रूप में बना उसके दोष भी पारद में रहना सम्भव है। इस लिये शुद्धि के समय जहां से खनिज पारद एकत्रित किया गया हो वहां के स्थान के संसर्ग से होने वाले सब दोषों का परिहार अवश्य कर लेना चाहिये । कितना सूक्ष्म विचार है । किन्तु दुःख है कि आजकल हम लोगों को यह भी पता लगाने की इच्छा नहीं कि बाजार में जो वर्तमान पारद आता है उसका उद्गम देश कहां पर है और उस देश में पारद के साथ सहयोगी धातु कौन २ निकलते हैं तथा उनका पारद पर क्या प्रभाव पड़ता है, अथवा उस की शुद्धि क्यों की जाती है और शुद्धि के द्रव्यों का पारद के ऊपर क्या प्रभाव पड़ता है । हम पारद के सब कृत्य केवल इस लिये करते हैं कि शास्त्र की आज्ञा है । इस प्रकार की उदासी का फल यह हो रहा है कि अन्धकार में प्रयत्न किया जा रहा है । करने वाले को बिना ज्ञान के काम करते रहने से उद्देश्य हीन की तरह श्रान्ति हो जाती है और वह उस प्रयत्न से विरत हो जाता है। यही कारण है कि वैद्य समाज पारद के बचे हुए अष्टकर्म को भी यथाविधि करने में उदासीन सा हो गया है। हमारे पूर्वाचार्यों ने पारद पर अथक परिश्रम कर उसके अनेक अद्भुत गुणों का ज्ञान प्राप्त किया और वह ज्ञान ऐसा स्थिर तथा व्यापक है कि प्रत्यक्षवादी आधुनिक पाश्चात्य वैज्ञानिक भी अनेक परीक्षाएं कर प्रायः उसी फल पर पहुंचे हैं । इस समय पौर्वात्य और पाश्चात्य ज्ञान को एकत्रित करके आगे बढ़ने के लिये प्रयत्न करना परमावश्यक है । जापान इसी कारण उन्नत हो रहा है तथा सारा संसार उसका मान करके उसके आविष्कारों से लाभ उठा रहा है । अभी हाल ही में उसने मोती को शीघ्र पैदा करने की क्रिया के आविष्कार से संसार में नवयुग उत्पन्न कर दिया है तथा “स्वात्तौ सागरशुक्तिकुक्षिपतितं तज्जायते मौक्तिकम्” की युक्ति का प्रायशः खण्डन कर अरबों का लाभ प्राप्त कर रहा है ।

पारद के भेद

रसो रसेन्द्रः सूतश्च पारदो मिश्रकस्तथा ।
इति पञ्चविधो जातः क्षेत्रभेदेन शम्भुजः ॥

इस प्रकार पारद के ५ भेद माने गये हैं। रस नामक पारद रक्त वर्ण का होता है इस को रेड आक्साइड आफ् मर्करी ( Red oxide of Mercury ) कह सकते हैं । रसेन्द्र नामक पारद रूक्ष तथा श्याव वर्ण का होता है इसको इम्प्प्योर ( Impure ) कह सकते हैं । सूत नामक पारद रूक्ष तथा कुछ पीतवर्ण की आभा से युक्त होता है